Saturday, 21 November 2015

BE FEERLESS: Grow Your Powers ताकतों का विस्तार

BE FEERLESS: Grow Your Powers ताकतों का विस्तार: NASAL POWER , EYE POWER , MENTAL POWER , GROW YOUR MENTAL POWER मै एक दिन मनकापुर जा रहा था , मै कई सालों से उसी रोड से जा रहा हूँ , उसी ...

How to grow mental powers , कैसे करें अपनी ताकतों का विस्तार ?


 MENTAL POWER , GROW YOUR MENTAL POWER
मै एक दिन मनकापुर जा रहा था , मै कई सालों से उसी रोड से जा रहा हूँ , उसी दुकान के बगल से जाता हूँ , वह दुकान बंद ही रहती है। उस दिन भी वह दुकान बंद थी ,  पर उस दुकान को देख कर जाने क्यों उस  दिन अचानक से तिवारी की याद आ जाती है। तिवारी से मेरा कभी कुछ लेना देना नहीं था , हाँ  मेरे एक मित्र ने उस से फर्नीचर बनवा कर ट्रक से मुंबई भेजा था , उन्ही के साथ मै तिवारी के दुकान पर एक दो बार गया था , पर पिछले कई सालों से वह दुकान बंद कर के कहीं बाहर चला गया था।
दो दिन बाद जब मै  उधर से निकल रहा था तो अचानक मुझे तिवारी दिख गया।  गाड़ी पर बैठे बैठे मैं सोचने लगा , अभी तक मुझे तिवारी की याद क्यों नहीं आई थी ? ये कैसा कनेक्शन है ?
ऐसा ही होता है , कई बार ऐसा होता है , आप के जीवन में भी इस तरह की घटनाएँ जरूर हुई होंगी।  मै  इन चीजों  पर ज्यादा ध्यान देता हूँ इस लिए कुछ उदहारण देता हूँ - जब मै बाहर होता हूँ तो , कई बार एक ही समय पर ,  मै पत्नी को , और मेरी पत्नी मुझ को फ़ोन कर रही होती है , घर पहुँचने वाला होता हूँ तभी अचानक से खाने के बारे में सोचता हूँ , और घर पर वही बना होता है जो थोड़ी देर पहले मै  सोच रहा था। जिस दिन मै  सोचूँगा , कि मै कितने दिनों से बीमार नहीं हुआ ? शाम तक बीमार  हो जाता हूँ। कहते हैं जब आप किसी के ज्यादा नजदीक हो जाओ तो कुछ दिन बाद दोनों की सोच , पहनावा , चाल चलन एक जैसी हो जाती है।
यह कुछ नहीं , कुछ ताकतें हैं जो परमात्मा ने हम सब को बिना भेद भाव के दिए हैं। कुछ लोगों ने इन ताकतों पर ध्यान दिया , और उनका संवर्धन किया। आप ही नहीं सृष्टि के हर जीव की अपनी विशेषता है , सब के पास कुछ न कुछ अलग तरह की  ताकत है। आप की इन्द्रियाँ , आप का मस्तिष्क एक ताकत है।
आप कभी फुर्सत में हों तो आँख बंद कर लीजिये और प्रकृति के स्वाभाव को पहचनिये। एक चीज हर समय और लगातार हो रहा है , वह है सृजन , यानि  ताकतों का विस्तार।  पेड़ पौधे , पशु पक्षी सब किसी न किसी तरह अपनी ताकतों का विस्तार ही कर रहे हैं , पुनरुत्पादन भी  अपनी ताकतों का विस्तार है। जो जैसे कर सकता है कर रहा है।  जब आप दूरवीन बनाते हैं ,टीवी बनाते हैं  तो वह आपकी आँखों का विस्तार है , इसी तरह मोबाइल , रेडियो , स्टेथोस्कोप कानो के विस्तार हैं , मोटर साइकिल , कार , हवाई जहाज पैरों के विस्तार हैं।  आपकी नाक भी एक ताकत है , आप बिना देखे , बिना छुए  जान सकते हैं किधर कौन सी चीजें रखी हैं ? आप अगर इसकी ताकत का विस्तार कर लें तो बहुत दूर तक के चीजों के बारे में आप कहीं से भी जान सकते हैं।
इसी तरह जब हम अपने मन की ताकतों का विस्तार कर लेते हैं तो , बहुत से आश्चर्य जनक काम करने लग जाते हैं।
कैसे करें अपनी ताकतों का विस्तार  ?  मन की ताकतों का विस्तार हो सके इस के लिए जरूरी है कि आपका मन शांत हो , आप अंतर्मुखी हों।  प्रति दिन कम से कम एक घंटा अपनी शांति के लिए निकालें। आँख बंद कर लें और अंतरशून्य हो जाने दें , कुछ दिन के अभ्यास के बाद आपको स्वयं में परिवर्तन महसूस होने लगेगा। नाक की शक्तियों का विस्तार करने के लिए कुछ विशेष गंध को पहले नजदीक से सूंघ कर जान लेँ और फिर दूरी बढ़ा बढ़ा  कर उसे सूंघ कर खोजने का प्रयत्न करें। 

Wednesday, 18 November 2015

BE FEERLESS: FAITH

BE FEERLESS: FAITH: एक बार भगवान कृष्ण भोजन के लिये बैठे, राधा जी उनके पास ही बैठी थीं और पंखा कर रही थी। अभी भगवान ने पहला निवाला उठाया ही था कि पता नही क्...

Monday, 16 November 2015

OUR WORLD हमारी दुनिया

 OUR WORLD , GOD AND CREATIVITY , WORSHIP AND GOD , GOD AND FRAUD
उसका , एक काल्पनिक रतन का पूरा बदन टूट रहा था , उसके , शरीर की एक एक माँस पेशियाँ दर्द से कराह रही थी। उसे उसकी पत्नी ने घर से निकाल दिया था , लोगों ने बहुत मारा था , पुलिस ने उसे मार कर लॉक अप में बंद कर दिया था। वह बेहोश हो गया था। जब उसकी चेतना धीरे धीरे वापस आई तो उसे क्रमशः एक एक चीज याद आने लगा और वह सोचने पर मजबूर हो गया -
कैसे हैं लोग , लोगों की मित्रता और उनकी दुनिया ? कैसे हैं ये रिश्तों के बाज़ार ? जो सिर्फ एक शब्द पर बिखर जाते हैं। सब ने क्या नकली प्यार और जज्बात का चादर ओढ़ रखा है ? क्या सब अंदर से हिंसक हैं ?
जो अप्रत्यक्ष है , अन्जान है , जिसके बारे में बहुत सी शंकाएँ हैं , जो सत्य है या भ्रम है उसके लिए अपने ही लोगों ने उसे बहुत मारा , जलाने  की कोशिश की।  उस अप्रत्यक्ष के लिए एक प्रत्यक्ष जीते जागते भावपूर्ण इन्सान के साथ इतना बुरा व्यव्हार ?
रतन ने जीवन भर कानपुर की एक फैक्ट्री में काम किया था , उसने काम को अपना भगवन मान लिया था। उसे भगवान , देवी देवता , मूर्ति फोटो , हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई और न जाने कितने ३६५ धर्म समझ नहीं आते थे।  शिफ्ट , ओवर टाइम और समय से ड्यूटी आना जाना यही उसकी दुनिया थी।
परमात्मा , सृष्टि कर्ता , अल्लाह , जीसस सब के बारे में उसकी एक ही राय थी कि जिसे आप कल्पना कर सकें , जिसका आप निर्माण कर सकें , वह परमात्मा हो ही नहीं सकता , वह किसी लिमिट या दायरे में आ  ही नहीं सकता , आप जहाँ भी हैं , जिसमे भी है सब परमात्मा है। इसके अलावा उसे किसी परमात्मा या धर्म कर्म से कोई मतलब नहीं  था।  वह अपनी कमाई अपनी पत्नी को सौंप देता था  , वही घर चलाती थी।
कभी कभी इस बात पर रतन की अपनी पत्नी से झड़प भी हो जाती , वह कहता ,जब  परमात्मा तुम से छुप रहा है तो क्यों उसे ढूढ़ रही हो ? अगर उसे मानव के साथ मिलना होता तो वह खुद ही मिल लेता। प्रकृति जो चाहती है वही होने देती है  , उसे जो मानव को दिखानी  थी  वही  दिखाई  है जो नहीं दिखानी थी  वह नहीं दिखाई है। जैसे हवा है बहुत सारी गैसें हैं अगर दिखने वाली चीजें होतीं तो दुनिया कैसी होती ? आप की भावनायें , आपकी आवाज, गंध  अगर दिखने  वाली चीजें होतीं तो दुनिया कैसी होती ? दुनिया संतुलित रहे इस बात का उसने पूरा ध्यान  रखा है।
रतन का यह भी कहना था कि परमात्मा के नाम पर लोगों को धार्मिक जहर देना गलत है। अगर वह आपसे नहीं मिलना चाहता तो नहीं मिलेगा , आप चाहे जितना प्रयास कर लें।
रतन अब रिटायर हो चुका  था।  उसकी पत्नी  अभी किसी माताजी की शिष्य बनी थी , जिनका कहना  था कि वह  वह साक्षात् देवी हैं , वह सारे दुखों का हरण कर के मोक्ष प्रदान करती हैं। लोग आंधी तूफान की तरह उस देवी के भक्त बन रहे थे। जब लोग माताजी के चरण स्पर्श कर रहे थे और उनके पूजन की तैयारी चल रही थी तभी वह स्टेज पर चढ़ गया था और माइक पर बोला , मोक्ष इनकी पॉकेट में नहीं रखा है ,जो आपको बाँट देंगी। आपको मोक्ष नहीं , आपके सब काम करने वाला एक नौकर चाहिए।  
इतना बोलना ही उसकी दुर्गति का कारण बन गया था। 

Saturday, 14 November 2015

Right Way of talking ,बात चीत का सही तरीका

बात चीत का सही तरीका

 आप किसी के बारे में अगर सबसे ज्यादा जानना चाहें तो सिर्फ दो मिनट उससे बात करिये और उसका जीवन कैसा है , वह सुखी है , अमीर है या सफल है , आप सब कुछ जान  सकते हैं।  बात चीत का सही तरीका न केवल आपको सम्मान दिला सकता है बल्कि आप को कुछ भी बना सकता है।

जब आप दो लोग आपस में बात कर रहे हों और कोई तीसरा आ कर आप की बात सुनने  लगे  या बीच में बोलने लगे तो कैसा लगता है ? या सवाल आप किसी से पूछें और जवाब कोई और दे , या कोई जबरदस्ती अपनी राय आप के ऊपर मढ़ने लगे, या आपकी बात पर ध्यान न दे और आपकी बात पूरी होने के पहले ही अपनी बात शुरू कर दे , तो कैसा लगता है ? बिलकुल अच्छा नहीं लगता है , आप ही नहीं किसी को भी अच्छा नहीं लगता है।
यह तरीका जीवन के व्यवहारिक पक्ष में कितना घातक हो सकता है ? इसका एक सत्य उदहारण मै  देना चाहूँगा।  मेरे एक रिश्तेदार हैं , मै उनका नाम पब्लिकली तो नहीं ले सकता , आप कुछ भी अपने से मान लीजिये। उनके माता जी का देहान्त हुआ तो , न तो कोई रिश्तेदार आया , न उनके मुहल्ले का कोई व्यक्ति लाश उठाने को तैयार हुआ , वह शाम तक रिश्तेदारों का इन्तजार करते रहे और जब कोई नहीं आया तो शाम को  डेड बॉडी टेम्पो पर लाद कर घाट पर ले गए।

ऐसा क्यों हुआ ? जरा उनके बारे में जान लीजिये।  वह ट्रेन में हों , बस में हों , घर में हों , रिश्तेदारी में हों या  कहीं भी हों , उनके सामने किसी टॉपिक पर , कोई भी व्यक्ति , कोई चर्चा कर दे , तो उसको वे अपने लिए एक चैलेंज मान लेते हैं और उस पर तब तक बहस करते रहेंगे , जब तक सामने वाले को उठने या भागने पर मजबूर न कर दें , या उसे हरा न दें।  पर आप जानते हैं उनके इन आदतों की वजह से हम सब उन से बातचीत में घबराने लगे , उनसे दूर होने  लगे।   वे अगर मोबाइल पर फ़ोन करते हैं तो मेरी पत्नी या बच्चे उनका  फ़ोन नहीं उठाते , क्यों कि वे हर बात में से बात निकल कर बहस करने लगेंगे ।  मै उठाता हूँ तो , जैसे ही वह बातचीत  लम्बा करने  की कोशिश करते हैं , मुझे कहना पड़ जाता है कि , भइया मुझे कुछ जरूरी काम है , कुछ जरूरी बात पहले कर लीजिये और मै बरी हो  लेता हूँ।
इसी तरह मै ही नहीं सब को बुरा लगा और वह इतनी बुरी स्थिति में आ गए , लेकिन आप क्या समझते हैं कि  उन्हें कभी ये लगा कि वे कुछ गलत कर रहे हैं , नहीं उनके अनुसार लोग बुरे हैं।
अगर आप चाहते हैं कि  लोग आपको पसंद करें तो बातचीत में यह सावधानियां अवश्य रखें -
१ - जब दो लोग कोई आपसी बात कर रहे हों तो शामिल होने की कोशिश न करें।
२  - किसी की बातचीत चुपके से न सुनें।
३ - आप तब तक अपनी राय न दें जब तक आपसे मांगी न जाय।
४ - सामने वाले की बात सुनें और समाप्त होने पर ही अपनी बात शुरू करें।
५ - हर बात में दखलन्दाजी न करें।
६ - किसी और से पूछे गए सवाल का जवाब आप न दें। 

Friday, 13 November 2015

GEETA PART 6, गीता अंक 6

GEETA PART 6, गीता अंक 6, Shri Mad Bhagvat gita Part 6
KRISHNA1
श्लोक 4: । अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
। युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः।।
शब्दार्थ: युर्दोधन कहता है कि यहाॅ पाण्डवों की इस सेना मे भीम और अर्जुन जैसे युद्ध करने वाले बहुत सारे                   धनुर्धर और महारथी हैं, जैसे युयुधान , विराट और द्रुपद।
व्याख्या: पिछले श्लोकों मे दुर्योधन गुरू द्रोणाचार्य से बातचीत मे गुरू द्रोणाचार्य को अपनी वाक्पटुता से इस बात के लिये प्रेरित करता है कि पाण्डु पुत्र सिर्फ मेरे ही नही आप के भी दुश्मन हैं, कल आपने जिन जिन को युद्ध की कला सिखायी आज वही आप के खिलाफ धनुष लेकर तैयार हैं। उसकी जुगत यही है कि मै , गुरू द्रोणाचार्य को पाण्डु पुत्रों के खिलाफ इतना भड़का दूॅ कि वे , उनके वध मे जरा सा संकोच न करें।
इस श्लोक मे दुर्योधन तीन लोगों का नाम लेता है और उन्हे मामूली योद्धा नही बल्कि बलवान शूरवीर और युद्ध मे भीम और अर्जुन के समान बताता हैं।
वह पहले नाम लेता है युयुधान का , जिसका दूसरा नाम है सात्यकि। सात्यकि ने चॅू कि शस्त्र विद्या अर्जुन से सीखी थी , इस लिये वह अर्जुन के प्रति पहले से कृतज्ञ था , दूसरे सात्यकि की कृष्ण के प्रति बहुत ज्यादा आसक्ति थी इस लिये वह कृष्ण के नारायणी सेना के साथ न जा कर कृष्ण के साथ पाण्डवों की तरफ से युद्ध के मैदान मे था।
दुर्योधन दूसरा नाम लेता है , राजा विराट का , जब कि राजा विराट का दुर्योधन से कोई बैर भाव नही था पर वह राजा विराट का नाम क्यों लेता है ? वह यह सब उकसाने के लिये करता है, कि यह वही राजा विराट है जिसके कारण हमारा वीर सुशर्मा अपमानित हुआ और आप को सम्मोहन अस्त्र से सम्मोहित होना पड़ा और हम लोगों को युद्ध से भागना पड़ा।
राजा विराट का पाण्डवों से सम्बद्ध होने का एक विशेष कारण था, राजा विराट अर्जुन से विशेष प्रभावित थे और वे अपनी पुत्री का विवाह अर्जुन से करना चाहते थे पर अर्जुन ने उत्तरा को संगीत सिखाया था और वे उसे पुत्री भाव से देखते थे, इस लिये उन्होने उत्तरा का विवाह अपने पुत्र अभिमन्यु से करा दिया दिया। इस तरह राजा विराट अर्जुन के सम्बन्धी बन गये और इस कारण वे पाण्डवों की तरफ से युद्ध के मैदान मे थे।
दुर्योधन तीसरा नाम लेता है , राजा द्रुपद का, राजा द्रुपद और द्रोणाचार्य के अनबन के बारे मे पहले ही चर्चा हो चुकी है, पिछले अंक मे ।
गीता का शेष भाग अगले अंक मे -----
आज गीता का मनन और अनुपालन हमारे समाज के लिये ज्यादा आवश्यक हो गया है।
गीता की यह व्याख्या पसंद आये तो समाज हित मे शेयर करना न भूलें।
आपने पढ़ा , आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद।

Thursday, 12 November 2015

परमात्मा को नाराज न करें God will be Angry

हम अपने जीवन का ज्यादातर हिस्सा इसी उम्मीद में, इसी प्रयास में गुजार  देते हैँ  कि , लोग हमें जानें , लोगों का ध्यान हमारी तरफ आकर्षित हो। दुनिया भर में जितनी भी लड़ाइयाँ हुई है , वे सर्वाइवल के लिए कम और नाम कमाने के लिए ज्यादा हुई हैं।  अगर हमारी निजी जरूरत न हो तो , हम एक सुई भी, तब ही हिलायेंगे जब , उसका हमें कोई सामाजिक लाभ हो रहा हो। बड़ा घर, बड़ी गाड़ी, सब इसी का बदला हुआ रूप है कि  लोग हमें पहचाने, हमारा सामाजिक रुतबा हो,  लोगों का ध्यान हमारी तरफ आकर्षित हो।
 मै एक छोटा सा लेख अगर पोस्ट करता हूँ तो. मेरी तो यही इच्छा होती है कि दुनिया के सारे लोग उसे पढ़ें, वो अलग बात है कि  ऐसा संभव नहीं है। ऐसा इस लिए है , क्यों कि  यह मेरी कृति है।  आप का छोटा बच्चा है, वह एक कागज का जहाज भी बनाता है तो,  दस बार आप को दिखाने आएगा , उसका भी लक्ष्य यही होता है कि  आप उसकी तरफ ध्यान दें , उसकी कृति को तवज्जो दें। यदि आपने  या किसी  ने भी , उसके जहाज यानि उसकी कृति को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की तो वह उससे नाराज हो जाता है। 
जब आप , हम या एक बच्चा अपनी कृति की क्षति को बर्दास्त नहीं कर सकते तो हमारा परमात्मा अपनी कृति को  क्षति ग्रस्त होते हुए कैसे बर्दास्त कर सकता है ? जब हम धार्मिक लड़ाइयों की खातिर लोगों की जानें  लेते हैं , तो हम  परमात्मा की कृति को क्षति ग्रस्त करते हैं जो परमात्मा को नाराज करता है। 
अब आप  कह सकते हैं कि पशु पक्षी तो रोज ही अपने भोजन की खातिर परमात्मा की  कृति को क्षति ग्रस्त करते हैं , आप बिल्कुल सही कह रहे हैं , पर वे  परमात्मा की  कृति को क्षति ग्रस्त करने के बजाय एक प्राकृतिक संतुलन पैदा कर रहे हैं।  अगर ऐसा न हो पूरा समुद्र मछलियों से भर जाय , पूरी धरती मनुष्यों के बजाय कीड़ों मकोडों और पशु पक्षियों से भर जाय। 
धर्म के नाम पर हत्याएँ बंद करिये , धर्म के ठेकेदारों का पीछा छोड़ कर खुद से ज्ञान प्राप्त करिये और आनंद की प्राप्ति करिये। वरना  परमात्मा की  कृति को क्षति ग्रस्त  करना हम सब पर भारी पड़ सकता है , वह कभी भी नाराज हो सकता है , और नाराज होता ही है , हमारे पास ऑंखें होनी चाहिए उसका कोप देखने के लिए। 
  

Tuesday, 10 November 2015

Happy Deepawawali, an emotional story

deepawali 1
शिवा के घर में आज ज्यादा चहल पहल थी । आज दीपावली जो थी । घर में सब थे, बूढ़े मां-बाप, पत्नी दो बच्चे एक लड़का एक लड़की । दोनों अपनी पढ़ाई पूरी कर के जॉब पर लग गए थे। बच्चे आते समय अपने मम्मी पापा के लिए, दादा दादी के लिए गिफ्ट लाना नहीं भूलते थे, सब के लिए कपड़े हो कुछ और जरुरत के सामान जरूर लाते थे, दीपक और दिव्या नाम थे शिवा के बच्चों का। दीपक बिल्कुल दीपक की तरह, घर और खानदान का नाम रोशन कर रहा था । अपनी B.Tech की पढ़ाई पूरी कर के मल्टीनेशनल कंपनी में लग गया था, दिव्या भी कुछ कम नहीं थी वह CA की पढ़ाई पूरी कर के Pune की किसी कंपनी में लग गई थी। कुल मिलाकर एक संतुलन बन गया था, सब बहुत खुश थे, शिवा के मां-बाप भी अभी ज्यादा बूढ़े तो नहीं थे पर उनको बुढ़ापे वाली बीमारी थी।
शिवा का जीवन इस समय एक दम खुशहाल था , आर्थिक स्थिति बहुत बढ़िया थी, बाबूजी का पेंशन, खुद एक मिल श्रमिक की तनख्वाह , बच्चों की सैलरी मिलाकर अच्छी Income थी। सबने मिल कर इस धनतेरस पर एक कार खरीद लिया था, सब बहुत खुश थे सबको आज दीपावली के दिन किसी धार्मिक स्थल पर अपनी फैमिली कार से ड्राइव पर जाना था, सब अपने-अपने नए कपड़े पहन कर तैयारी बना रहे थे , शिवा माला को बार-बार किसी न किसी काम के लिए आवाज दे रहा था, माला शिवा की पत्नी का नाम था, आज माला भी बहुत खुश थी Excited थी , * आज शिवा के किसी भी कॉल पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही थी, नहीं तो शिवा के ज्यादा आवाज लगाने पर कुछ न कुछ speech देती , माला शिवा के नए जूते और कपड़े लायी , तुम किसी महाराजा की तरह लग रहे हो जी, माला शिवा की तारीफ में बोले जा रही थी खुशी और excitement में बोले जा रही थी, शिवा,  सिवाय मुस्कुराने के कुछ नहीं कह रहा था , तभी माला से शायद कुछ गलती हो गई , उसने कहा सुनते हो जी, मेरे भैया ने, भाभी से झगड़ा कर लिया है , और कह रहे है,  दीपावली के बाद संयास ले लूंगा, शिवा अब तक शांत था और मुस्कुरा रहा था, बोला, वह सन्यास नहीं लेंगे, सन्यास उनके बस का नहीं है, जिसको संयास लेना होता है वह कहता नहीं है, माला ने कहा, जैसे तुमको लेना हो, तो ले ही लोगे, शिवा बोला तो कुछ नहीं पर जैसे ही माला अंदर गई वह संयास के लिए चल पड़ा। अपने पीछे एक note छोड़ गया, आप सबको हैप्पी दीपावली। यह दीपावली मेरे लिए कुछ ज्यादा ही खास है, मैं उसको खोजने जा रहा हूं जो अंदर जलता है] अंतरात्मा में। तुम सब ना परेशान होना , ना ढूंढने की कोशिश करना, परमात्मा का शुक्रगुजार होना
जिन्होंने मुझे वह power दिया, कि मैं असली दीपक से दीपावली मना सकूं, दीपावली का आनंद मनाओ खुश रहो मैंने आज से अभी से सन्यास धारण कर लिया है , अब पूरा गगन और पूरी] धरती मेरे पिता और मां है,
और पूरी दुनिया के लोग मेरा रिश्तेदार है, सन्यास वही धारण कर सकता है जो स्वस्थ हो संपन्न हो और  आर्शीवादित हो। आज अमावस्या की रात मुझे अन्तरात्मा का दीपक जलाने दो।

Monday, 2 November 2015

गीता अंक 3 GEETA PART 3


महाभारत यानि एकता की कमी और अहंकार की अधिकता
प्रथम अध्याय:श्लोक 1: धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
  ममकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।
शब्दार्थ: धृतराष्ट्र संजय से कहते हैं-
हे संजय! धर्मभूमि कुरूक्षेत्र मे, युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुये मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
श्लोक 2:  । दृष्टा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
       । आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ।।
शब्दार्थ:  अब दूसरे श्लोक मे संजय, धृतराष्ट के प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं कि हे महाराज , पाण्डु पुत्रो के द्वारा रचे गये सेना की बज्रव्यूह रचना को देख कर राजा, दुर्योधन गुरू द्रोणाचार्य के पास गये और ये वचन बोले-
व्याख्याः-यह प्राकृतिक नियम है कि , जहाॅ जहाॅ भी आपसी मतभेद होता है वहाॅ शक्ति और प्रभाव भी पूरा नही पड़ता है। कौरवों और पाण्डवों मे यही नीतिगत अन्तर था जहाॅ पाण्डवों की सेना थोड़ी होते हुये भी संगठित थी, एकमत थी और एक ही भाव से खड़ी थी वहीं कौरवों की सेना मे अलग अलग मत थे। कौरव बन्धु तो युद्ध चाहते थे पर गुरू द्रोण, भीष्म और विकर्ण आदि युद्ध नही करना चाहते थे क्यों कि उन्हे लगता था कि यह युद्ध मानवता विरोधी है, अनैतिक है। जहाॅ पाण्डवों के पक्ष मे भगवान श्रीकृष्ण थे और धर्म था वहीं दुर्योधन सदैव से ही छल कपट और अनीति से युद्ध जीतना चाहता था।
दुर्योधन के पास बड़ी सेना थी, एक से बढ़ कर एक धुरंधर वीर थे, पर वे मन से एक नही थे, वह यह बात जानता था, इस लिये जब उसने पाण्डवों का बज्रव्यूह देखा तो वह अन्दर से हिल गया और  गुरू द्रोणाचार्य के पास जाता है पर उसका अहंकार अभी भी उसके साथ है। उसे जाना तो चाहिये था मंत्रणा और आदेश के लिये पर वह राजा के भाव से युद्ध का आदेश देने जाता है। उसके मन मे अभी भी छल है वह अभी भी द्रोणाचार्य को कौरवों के प्रति उकसाने के मकसद से जाता है जब कि द्रोणाचार्य के पास युधिष्ठर भी जाते हैं, वे अपने समस्त अहंकार त्याग कर, राजा के समस्त लक्षण त्याग कर और अपने दोनो हाथों को जोड़ कर द्रोणाचार्य के पास युद्ध की अनुमति लेने जाते हैं।
अब हम यहाॅ देख सकते हैं कि दोनों के स्वभाव कितने विपरीत हैं तो परिणाम तो विपरीत होना ही था। इसी लिये कहा गया है कि सदैव उसका साथ देना चाहिये जो धर्मानुकूल व्यवहार करता हो , भले ही वह क्षणिक रूप से कमजोर ही क्यों न हो ?
शेष अगले अंक मे -----
आज गीता का मनन और अनुपालन हमारे समाज के लिये ज्यादा आवश्यक हो गया है।
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Saturday, 31 October 2015

सन्तों की अजब कहानी -


सन्त कबीर के जीवन मे एक कथा है जो सामान्य जनमानस के जीवन परिधि से परे है। कबीर के यहाॅ रोज शाम को धर्म चर्चा होती, उस चर्चा मे कभी कभी देर भी हो जाता और कबीर अपने सन्त सुलभ स्वभाव वश , सब सन्त जनों को भोजन के लिये रोक लेते , यह उनके रोज के जीवन मे शामिल हो गया था।
कबीर जी खुद तो बाहर चर्चा मे रहते,  और वहीं से अपनी पत्नी लोई को आवाज लगा देते कि इतने सन्तों का भोजन बनना है। इसके बाद की जिम्मेदारी लोई की होती थी, कि वह भोजन का इन्तजाम करे , चाहे जैसे करे। इस सब मे कभी कभी लोई को अपने बच्चों को भूखा रखना पड़ता। वह दिन मे कबीर से रोज श्किायत करती कि ऐसे कैसे चलेगा ? आप रोज इतने लोगों को क्यो भोजन का न्योता दे देते हैं ? जब कि अपने खुद के बच्चे भूखे रह जाते हैं।
एक दिन धर्म चर्चा के बाद करीब दस सन्यासी बच गये। लोई ने किसी बहाने से कबीर को अन्दर बुलाया और बताया अब तो बनिये ने भी उधार देने से मना कर दिया है, आज किसी को भोजन के लिये मत कहना,  पर कबीर ने कहा कुछ भी करो , मेरे घर से सन्यासी कैसे भूखे जा सकते हैं ? कुछ गिरवी रख कर ले आओ, सन्तों को तो भूखा नही रख सकते।
लोई ने सन्तों को भोजन तो करा दिया पर जिस शर्त पर बनिये ने सामान दिया था, वह सामान्य जन मानस के सोच मे नही समा सकता। बनिये की शर्त थी कि तुम कबीर की पत्नी हो, तुम अपने वादे से नही मुकरोगी, इस लिये मै तुम्हे अन्न तो दे दॅूगा , पर अन्न के बदले एक वादा कर के जाओ कि, सन्तों को भोजन कराने के बाद रात के अॅधेरे मे मुझे खुश करने आ जाओगी। सन्तों के भोजन का सवाल था, वह खुद भी सन्त की पत्नी थी और कबीर ने कह रखा था कि कुछ भी गिरवी रख कर ले आओ। लोई के पास कुछ बचा तो था नही गिरवी रखने को, उसने अपने तन का सौदा कर लिया।
सन्तों के भोजन कर लेने के बाद लोई ने साफ साफ कबीर को बनिये के शर्त के बारे मे बता दिया, और कहानी कहती है कि कबीर स्वयं लोई को ले कर बनिये के पास गये कि, यह लो अपनी अमानत और अपनी शर्त पूरी कर लो। कहानी आगे कहती है कि बनिये को कबीर मे, जग और सन्तों के रखवाले श्रीराम के दर्शन हुये , वह कबीर के चरणों मे गिर गया कि एक आप हैं कि, धर्म और सन्तों के भोजन के लिये अपनी पत्नी को मेरे हवाले कर रहे हैं , एक मै पापी हॅू कि कुछ अन्न के बदले आप की पत्नी पर बुरी नजर डाला। जिस देश मे आप जैसे सन्त पैदा हों उस देश से धर्म का विनाश कोई नही कर पायेगा।
कबीर ने जात पाॅत , ऊॅच नीच कभी नही माना, और अपने ही प्रेम की मस्ती मे जीवन भर रहे।

Friday, 30 October 2015

GEETA PART 2 , गीता अंक 2,


 महाभारत या धर्म की अनदेखी  
स्वयं पाप न करना, परन्तु पाप कर्म होते हुये देखना या उसमे मूक सहमति देना, पाप करने से ज्यादा वीभ्त्सकारी है, इस बात का प्रमाण है महाभारत का युद्ध।
कुरूवंश मे धर्म का पालन होता था, इसी लिये युद्धभूमि जैसी जगह को भी धर्मभूमि की संज्ञा दी गयी थी, यानि युद्ध कर्म को भी धर्म समझा जाता था। धृतराष्ट्र ने पुत्र मोह मे उस समय मुॅह नही खोला या दुर्योधन को नही रोका जब  उसने भीम को जहर दे कर जल मे प्रवाहित कर दिया,  जब उसने, पाण्डवों को उस समय लाक्षगृह मे जलाने की कोशिश की, जब कि वे बेचारे शर्त को मानते हुये अज्ञात वास पर थे।  धृतराष्ट्र ने उस समय भी मुॅह नही खोला जब दुर्योधन ने जुये मे शकुनि के साथ मिल कर, दुर्योधन के साथ छल किया और भरी सभा मे द्रौपदी को नग्न करने की कोशिश की। यदि धृतराष्ट्र समय रहते धर्म के पक्ष मे मॅुह खोलते और अपने पुत्रों को रोकते तो भी शायद यह युद्ध न होता, पर अपने पुत्र को राजा बनाने की इच्छा उन्हे मौन धारण करने हेतु प्रेरित किया।
 इस बात का दुख माता कुन्ती को भी था कि वे सब आपस लड़ते मरते, कुछ भी करते पर बीच मे अपने अहंकार के कारण द्रौपदी को नंगा करने की कोशिश गलत था, इतना ही नही माता कुन्ती को इस बात का भी अत्यधिक क्लेश था कि जब भगवान कृष्ण संधि प्रस्ताव ले कर हस्तिनापुर गये तो दुर्योधन के मित्रों ने कृष्ण को बन्दी बनाने की कोशिश की।
  महाराज युधिष्ठर को धर्मराज कहा जाता था , उनकी इच्छा कदापि नही थी कि युद्ध हो और वे युद्ध न करते पर माता कुन्ती ने दुर्योधन जैसे अमानवीय और अधर्मी का विनाश करने के लिये ही पाण्डवों को युद्ध का आदेश दिया।
 जब जब धर्म को अनदेखा किया गया, और पाप को होने दिया गया, किसी न किसी रूप मे महाभारत होता आया है और होता रहेगा। आज इसी लिये गीता का अनुपालन हमारे जीवन मे और भी आवश्यक हो गया है। आज हमारा समाज व्यवस्थित रहे सुचारू रूप से चलता रहे इस हेतु धर्म का अनुपालन और आवश्यक हो गया है।

GEETA PART 2 , गीता अंक 2,

GEETA PART 2 , गीता अंक 2,

Thursday, 29 October 2015

गीता भाग 1 Gita Part 1


प्रथम अध्याय:
श्लोक 1: धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
  ममकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।
शब्दार्थ: धृतराष्ट्र संजय से कहते हैं-
हे संजय! धर्मभूमि कुरूक्षेत्र मे, युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुये मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
असल मे संजय गवल्गण नामक सूत के पुत्र थे, वे महान धर्मात्मा और ज्ञानी थे, इसी लिये वे  धृतराष्ट्र के मन्त्री थे। संजय के पास दिव्य दृष्टि थी पर ये उनकी अपनी ताकत नही थी यह तो उन्हे महर्षि वेदव्यास ने  धृतराष्ट्र , को युद्ध का आॅखो देखा हाल सुनाने के लिये दिया था, क्यों कि महर्षि वेदव्यास ने दुर्योधन के रवैये को पहचान लिया था, उसके अहंकार और अनैतिक व्यवहार से उन्हे लग गया था कि युद्ध तो अवश्यभंावी है।
 दुर्योधन को जब लोगों ने समझाने का प्रयास किया कि जो तुम कह रहे हो कि बिना युद्ध के मै सुई के नोक बराबर जमीन भी नही दॅूगा यह गलत है, अनैतिक है, धर्म विरूद्ध है तो उसने कहा कि मुझे धर्म और नैतिकता का पूरा ज्ञान है, मै भी कह रहा हॅू कि युद्ध गलत है, पर मै अपनी भुजाओं के ताकत का क्या करूॅ ? अपनी युद्ध की कला का क्या करूॅ ? अपनी इस विशाल सेना और अपने महान धुरंधर मित्रों का का क्या करूॅ ? जमीन जायदाद तो युद्ध का एक बहाना है, युद्ध तो हो कर रहेगा। इस तरह से महाभारत , द्रौपदी के कारण नही बल्कि दुर्योधन के अहंकार और अतिरिक्त बल के कारण हुआ।
जैसे हमारा कोई विकलांग बच्चा हो , तो बाकी बच्चों की तुलना मे हमारा विशेष स्नेह अपने विकलांग बच्चे पर होगा उसी तरह महर्षि वेदव्यास, धृतराष्ट्र के अंधेपन के कारण उन्हे बहुत ही स्नेह देते थे। उस स्नेहवश महर्षि वेदव्यास ने उनसे कहा , अब , जब कि क्षत्रियों का विनाश तय है, तो यदि तुम्हे युद्ध देखने की आकांक्षा हो तो मै तुम्हे दिव्य दृष्टि दे सकता हॅू कि तुम यहीं से बैठे बैठे जान सकते हो कि कुरूक्षेत्र मे क्या हो रहा है ? पर धृतराष्ट्र ने अपने कुल का संहार स्वयं की आॅखों से देखने से मना कर दिया। उनका कहना था कि जब मै जीवन भर अंधा था मैने कुछ भी अच्छा बुरा नही देखा तो अब वृद्धावस्था मे अपने ही वंशज का विनाश अपनी आॅखो से क्यों देखॅू ? इसके बजाय उन्होने यह इच्छा अवश्य जाहिर की कि, मै युद्ध का एक एक समाचार जरूर सुनना चाहॅूगा, और इसी कारण व्यास जी ने यह ताकत धृतराष्ट्र के मन्त्री संजय को दिया। वह दिव्य दृष्टि ऐसी थी कि संजय धृतराष्ट्र के बगल मे बैठे बैठे ही न सिर्फ युद्ध को देख सकता था, बल्कि सैनिकों या युद्ध भूमि मे मौजूद किसी के भी मनोभावों को पढ़ सकता था जान सकता था।
अब उसी कड़ी मे धृतराष्ट्र युद्ध समाचार जानने हेतु संजय से कहते हैं-
हे संजय! धर्मभूमि कुरूक्षेत्र मे, युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुये मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
शेष अगले अंक मे

गीता भाग 1 GEETA PART 1

गीता भाग 1 GEETA PART 1

Sunday, 25 October 2015

FAITH


एक बार भगवान कृष्ण भोजन के लिये बैठे, राधा जी उनके पास ही बैठी थीं और पंखा कर रही थी। अभी भगवान ने पहला निवाला उठाया ही था कि पता नही क्या सोच कर भोजन छोड़ कर एक दम से महल के बाहर भागे, पीछे पीछे राधा जी भी भागीं। राधा जी को बहुत अचम्भा हुआ कि ऐसा क्या हुआ कि स्वयं दीना नाथ को भोजन छोड़ कर भागना पड़ा ? अभी सब लोग सोच विचार कर ही रहे थे कि कि भगवान वापस आते हुये दिखायी दिये, और आते ही वापस भोजन के लिये बैठ गये। राधा जी के मुख पर प्रश्नवाचक भाव था। जब राधा जी को कुछ जवाब नही मिला तो भोजनोपरान्त उन्होने आखिर पूछ ही लिया ”नाथ आप का जाना और फिर रास्ते से ही वापस आना कुछ समझ नही आया।” भगवान मुस्कुराये और जबाब दिये कि ”मेरा एक परम भक्त था, लोग उसे पत्थर मार मार रहे थे, मै उसे बचाने के लिये भागा, पर मेरे पहुॅचने के पहले उसने स्वयं पत्थर हाथ मे ले लिया। जब वह स्वयं मुकाबले मे आ गया तो मेरी आवश्यकता ही समाप्त हो गयी और मै वापस आ गया।”
सही बात है, हमे लगता है कि हम सब कुछ करते हैं, और जब तक हम इस अहंकार मे रहते हैं, हमे सही मार्ग नही मिलता, हमे परमात्मा से सहयोग नही मिलता, हमे ज्ञान नही मिलता। जब आप अपना अहंकार , कि मै ही सब कुछ करता हॅू, भूल कर परमात्मा की शरण मे पूरी तरह आ जाते हैं तो फिर परमात्मा अपनी जिम्मेदारी समझ कर आप की रक्षा करता है, आप को मार्ग दिखाता है।
ज्ीवन मे जब भी आप को कुछ समझ न आये, आप को रास्ता न मिले तो आप परमात्मा पर छोड़ कर देखिये। परमात्मा स्वयं तो नही आता, पर आप को रास्ता दिखाने के लिये किसी न किसी रूप मे आता अवश्य है, आप चाहें समझ सकें या न समझ सकें। असल मे जिस क्षण हम अहंकार शून्य होते हैं, उसी समय से आप परमात्मा की शरण मे आ जाते हैं।

Saturday, 24 October 2015

Bad Rules


लोग क्या कहेंगे ? इस बात का डर, स्ंकोच आदि वह चीज होते हैं जो बच्चों कुंठित ही नही करते बल्कि उन का सब कुछ छीन सकते हैं
मैने देखा है लोग अपने बच्चों को ज्यादा सौम्य और सुशील बनाने के चक्कर मे संकोची बना देते है, उन्हे डरा कर उनकी लीडरशिप छीन लेते हैं जो कि उन्हे हर क्षण उनके विकास मे सहायता के साथ उनकी रक्षा करता।
राहुल एक बहुत ही प्यारा और बुद्धिमान बच्चा था। उसकी राइटिंग की सभी तारीफ करते थे, उसके मार्क सदैव 80 प्रतिशत से ऊपर होते थे, समय से स्कूल आना, समय से स्कूल जाना, सब को उचित सम्मान देना, उस बच्चे की जितनी तारीफ की जाये, कम थी। उसके गाल इतने चिकने और गोल मोल थे कि कोई भी उसे छू देता था। वह अपने परिवार और रिश्तेदारों मे सब को प्यारा था।
राहुल के अब हाई स्कूल के एक्जाम नजदीक आ गये थे, उसके पापा जो कि एक परचून की दुकान चलाते थे, थोड़े थोड़े चिन्तित हो रहे थे, क्यों कि उन्हे तो टाइम मिल नही पाता था, पत्नी उतनी पढ़ी नही थी कि राहुल को मैथ और्र इंिग्लश पढ़ा सके, और उनके पास ट्यूशन कराने का बजट नही था। राहुल भी कभी कभी तनाव मे हो जाता , क्यों कि कुछ प्रश्नो को हल करने के लिये कुछ न कुछ मदद की दरकार हो जाती और तब, जब उसे मदद नही मिल पाती तो वह चिंतित हो जाता। बेटी रिया राहुल से छोटी थी और सातवें मे पढ़ रही थी।
राहुल की पढ़ाई के लिये ऊपर का एक मात्र कमरा खाली कर दिया गया था, जहाॅ कभी कभी रिया भी पढ़ने आ जाया करती थी। मार्च मे एक्जाम थे और अभी फरवरी की शुरूआत थी, जाड़ा अभी चल ही रहा था इस लिये रजाई ओढ़ कर पढ़ने मे राहुल को बहुत मजा आ रहा था। कभी कभी पढ़ते पढ़ते नीद भी आ जाती, पर खुद से आॅख भी खुल जाती और वह फिर पढ़ाई शुरू कर देता।
उस दिन शनिवार था। पापा जल्दी दुकान बन्द कर के आ गये, और आज उनके चेहरे पर विजयी मुस्कान थी, क्यों कि उनके साथ राहुल के मैथ के टीचर विजय सर थे। आते ही उन्होने आवाज लगायी ”बेटा राहुल देखो मेरे साथ कौन आया है ?” पापा ने राहुल को बताया कि विजय सर आज यहीं रूक कर तुम्हे मैथ पढ़ायेंगे। पर जहाॅ राहुल को प्रसन्न होना चाहिये था वह अन्दर ही अन्दर घबरा गया क्यों कि ये वही राहुल सर है जिनको उसने क्लास मे ही लड़कियों के पीठ पर चिकोटी काटते कई बार देखा था, वे उसका भी गाल अक्सर चूम लिया करते, पर उनका चूमना उसे अच्छा नही लगता था।
आज राहुल अकेले, विजय सर के साथ ऊपर के कमरे मे नही जाना चाहता था, पर वह किससे कहे और क्या कहे ? उसे कुछ समझ नही आया तो वह रिया को भी अपने साथ ले गया। रिया खाना खाने के बाद ज्यादा देर तक नही पढ़ पाती थी , वह दस बजे ही सो गयी। रात मे करीब 4 बजे रिया को बिस्तर मे कुछ हलचल महसूस हुई, पर वह नीद मे पलट कर फिर सो गयी। लेकिन थोड़ी ही देर मे उसे फिर एहसास हुआ कि विजय सर राहुल के पीठ पर चढ़े हैं और उसका मॅुह दबा के रखे हैं। उसे जैसे ही राहुल की कराहट का आभास हुआ उसने रजाई हटा दी। उसके रजाई हटाते ही विजय सर अपने कपड़े समेटते हुये छत से खिड़की पर लटकते हुये भाग गये। राहुल अपना दर्द भूल कर रिया को समझाने मे लग गया कि वह किसी को कुछ न बताये। रिया फिर से सो गयी।
सुबह जब तीनो नीचे नही आये तो राहुल की माॅ ऊपर आयी, रिया को जगाया और उन दोनों के बारे मे पूछने लगी। पहले तो रिया को कुछ नही समझ आया कि क्या करे ? पर उसने इशारों मे जहाॅ तक हो सकता था माॅ को समझा दिया। माॅ तो बिल्कुल सन्न रह गयी और बदहवाशों की तरह राहुल को ढूॅढना शुरू कर दी, राहुल कमरे के कोने मे डरा हुआ चादर लपेटे छिपा हुआ था।
राहुल संकोच न किया होता, उसका लीडर अगर दबाया न गया होता तो शायद यह न होता।

बेकार नियम Bad Rules

बेकार नियम Bad Rules

Friday, 23 October 2015

अनजान लड़का Unknown Boy

innocent
यह कहानी उन लोगों के लिये एक सीख है जो अपने बच्चों को नौकरों के भरोसे पालते हैं।
मै उन दिनों अपने मुम्बई आफिस मे पोस्टेड था। मेरा आफिस वी0 टी0 रेलवे स्टेशन से पैदल दूरी पर था, वहाॅ से चर्च गेट स्टेशन भी पास मे ही था। मेरी पोस्टिंग चॅू कि अस्थायी थी इस लिये कुछ दिनों के लिये मै अपनी पत्नी एवं बच्चों को भी मुम्बई ले आया था कि इसी बहाने मुम्बई घूम लेते हैं। मेरा शनिवार और रबिवार छुट्टी का दिन होता था, और बच्चों के लिये फुल मस्ती का दिन। उस सय मेरा बेटा सात साल का और बेटी पाॅच साल की थी। मै जब आफिस से लौट कर आता तो मुझे सब लोग तैयार मिलते, चाय पीने के बाद डेली हम लोग घूमने जाते, रात का खाना बाहर खाते हुये देर रात तक वापस आते।
मैरीन ड्राइव और जुहू बीच हम सब की पसंदीदा जगह थी। जब और कहीं जाने को नही समझ आता तो हम सब इन्ही किसी जगह पर चले जाते, एक छोटा सा टेन्ट किराये पर ले लेते, अपने बैग जूता चप्पल वगैरह उसमे रख देते और भीगी रेत और समुद्री लहरों का घंटों तक मजा लेते, थक जाते तो थोड़ी देर अपने टेन्ट मे रेस्ट ले लेते। दिन ढलते ढलते वापसी की तैयारी कर लेते। वे दिन मेरे परिवार के लिये किसी जन्नत मे वास से कम नही थे। पर एक दिन एक ऐसी घटना घट गयी जो हम आज तक नही भूले हैं।
शनिवार का दिन था, हम उस दिन करीब तीन बजे समुद्र के किनारे पहॅुच गये थे। बच्चे बहुत बहुत उत्साहित थे, धूप भी थोड़ी कम थी। बच्चे अपने बाल ले कर खेलना शुरू कर दिये थे। बराबर बीच पर जाते जाते बच्चे अब अभ्यस्त हो गये थे, वे अन्य बच्चों से भी घुल मिल जाते, उसी बहाने उन बच्चों के माॅ बाप से कभी कभी हमारी भी दोस्ती हो जाती और बच्चों का हमे थोड़ा कम ध्यान रखना पड़ता। उस दिन, करीब आठ साल का एक मासूम और सुन्दर सा बच्चा कहीं से आया, बहुत देर तक पहले तो वह बाहर बाहर से बच्चों का खेल देखता रहा, फिर कुछ देर बाद हमने देखा कि वह भी खेल मे शामिल है। र्कइे बार हमने कोशिश की कि जानें कि उसके माॅ बाप कौन हैं, या वह किसके साथ है ? पर वे हमें कहीं नजर नही आये, हम भी अपने अपने काम मे लग गये। शाम होते होते भीड़ कम होने लगी, हम ने टेन्ट जमा किया और अपने सामान समेटने लगे, तब तक वह बच्चा दूसरी तरफ जाने लगा था। हमने ज्यादा ध्यान नही दिया, और अपने आवास पर आ गये।
दूसरे दिन यानि रबिवार के दिन, मै साप्ताहिक विशेषांक ले कर आया। तीसरे पेज पर जो फोटो और हेडिंग छपी थी उसे देख कर मै तो सन्न रह गया, उस बच्चे की तस्वीर के ऊपर लिखा था ”बच्चे की समुद्र मे डूबने से मौत, माॅ बाप का पता नही”। हम सब ने अपना घूमने का प्रोग्राम कैन्सेल कर दिया था। मै जुहू पुलिस स्टेशन गया, जो मुझे जानकारी थी मैने इन्सपेक्टर को बतायींे । करीब 11ः30 बजे एक बदहवाश से पति पत्नी आये, ये बच्चा उन्ही का था।
शाम को सांध्य कालीन अंक मे मैने जो कहानी पढ़ी वह इस प्रकार है- वे पति पत्नी एक मल्टी नेशनल कम्पनी मे बहुत ही अच्छे और जिम्मेदार पोस्ट पर थे। यह उनकी एक मात्र सन्तान थी। बच्चे के लिये मुम्बई मे बड़ा फ्लैट, बड़ी गाड़ी और विदेश मे पढ़ाई करानी थी, इस लिये माॅ ने अपनी नौकरी जारी रखी थी। बच्चे को पालने के लिये, और घर की देखभाल के लिये उन्होने एक आया कर रखी थी। उस दिन शनिवार था, बच्चा जल्दी घर आ गया था। आया, उसे नाश्ता करा कर के खुद सो गयी। बच्चा पता नही किस मूड मे था और घर से निकल लिया और यह हादसा हो गया।
हम पति पत्नी पूरी रात नही सो सके। उस बच्चे का और उन दम्पत्ति का चेहरा मेरी आॅखों पर छाया रहा। ऐसा पैसा किस काम का जो अपने खुद के बच्चे की परवरिश न कर सके।

Wednesday, 21 October 2015

बाबू मुझे घर ले चलोगे ?

बाबू मुझे घर ले चलोगे ?

Babu mujhe ghar le chaloge ?


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Tuesday, 20 October 2015

ज्यादा बनो मत !

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प्यार , प्रेम एक ऐसी चीज , जिसे पाने के लिये , महसूस करने के लिये मानव तो क्या , देवी देवता , पशु पक्षी तक बेचैन रहते हैं। प्यार की माॅग कभी कम नही होती, पर इसको बाॅटने वाला कभी घाटे मे नही रहता, जितना ही बाॅटता है, उसका कई गुना उसे वापस मिलने लगता है। प्यार देने और लेने की कोई शर्त नही होती, जिसके अन्दर प्यार उपजने लगता है , वह देते समय कुछ भी नही देखता कि, किसे प्यार बाॅट रहा हॅू , क्यों बाॅट रहा हॅू ? उस के पास इतना ज्यादा होता है कि, वह बिना बाॅटे रह ही नही सकता, उसके लिये हर कोई सुन्दर है, पूरी प्रकृति सुन्दर है।
प्यार पाने का सबसे आसान तरीका है, सहज हो जाना, बनावटी पन से दूर हो जाना, अपने मूल स्वरूप मे रहना, यानि एक दम मौलिक स्वरूप मे आ जाना। जब आप अपने को दिखाने की कोशिश छोड़ देते हैं तो, आप एक दम प्रकृति के करीब हो जाते हैं , तब जो आप का स्वाभाविक स्वभाव होता है, वह सभी के दिल को स्वाभाविक रूप से छू जाता है। जब आप जो नही हैं, वह दिखने की कोशिश करते हैं, तो आप के व्यवहार का परिवर्तन स्पष्ट नजर आने लगता है। छोटे बच्चे भी जब आपस मे झगड़ा करते हैं तो कहते हैं ”ज्यादा बनो मत।”
बच्चे जब तक अपने सहज स्वभाव मे होते हैं, वो सबको निश्छल भाव से प्रेम देते हैं और सब को प्यारे होते हैं, वो गलती भी करते हैं तो भी उन्हे प्यार मिलता है, वे आपका दाढ़ी मूॅछ नोच लेते हैं, पर तब भी आप उन्हे और कस के चूम लेते हैं। वही बच्चे जैसे जैसे , धीरे धीरे बढ़ते हैं थोड़ी दुनियादारी और चालबाजी सीखते हैं, आप का व्यवहार उनके प्रति बदलता जाता है।
मेरे मुहल्ले मे जूली आयी, कब वह पूरे मुहल्ले के दिल मे समा गयी, हम जान ही नही पाये। वह बस इतना करती है कि मुहल्ले का कोई भी, कहीं भी मिल जाये, वह बेलाग उसके पीछे पीछे दूर तक जायेगी, मौका मिले तो हाथ पैर चूमने के साथ, ऊपर तक चढ़ने की कोशिश करेगी। उसको आप कुछ भी न दो तो भी उसका व्यवहार वही रहता है। उसका यह निश्छल प्रेम लोगों को अनचाहे ही उसका दीवाना बना देता है। उसका बिस्कुट खाने का मन होता है तो वह शापिंग सेन्टर चली जायेगी, वहाॅ उसे कोई न कोई बिस्कुट का पूरा पूरा पैकेट खिलाता ही खिलाता है। अब तो आप समझ ही गये होंगे, जूली कौन है ? जी हाॅ जूली एक प्यारी सी देशी कुतिया है जो मेरे मुहल्ले की रानी है। उसके प्यार के कारण, पूरा मुहल्ला उसका रक्षक है। प्यार बाॅटना हम रोज उससे सीखते हैं।julie
काश हमारी जरूरतें ज्यादा न होतीं तो हम भी इतने चाल बाज नही होते, हमारा समाज हमे होशियारी नही सिखाता और हम असली जन्नत मे होते।

Thursday, 15 October 2015

where is love प्रेम है कहाॅ

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सारे धर्म कहते हैं प्रेम करो पर क्या आप को लगता है कि, किसी धर्म मे प्रेम बचा है ? धर्म की आड़ मे जितनी क्रूरता पूर्ण हत्यायें हुई हैं उतनी शायद और किसी कारणों से हुई हो। फिर कैसा प्रेम ? हम धर्म की बातें चाहे जितनी कर लें , पर असल मे हमारे अन्तस्तल मे तो बम है, जानवर है, जरा सी किसी ने हमारे धर्म के विरोध मे कहा कि हमारा विस्फोट हो जाता है। धर्म चाहे जो हो पर अगर वो हमारा अन्तस्तल परिवर्तित न कर सके, हमे सही मार्ग न दे सके तो वह दो कौड़ी का है, वह सिर्फ समय और धन का दुरूपयोग है। धर्म का सहारा मानव सभ्यता को विकसित करने के लिये होना चाहिये, न कि लड़ाने और तोड़ने के लिये। धर्म कोई भी बुरा नही है, बुराई है उसे अपने मतलब के लिये इस्तेमाल करना। दंगे और कुछ नही, अपने पीछे भीड़ जमा करने की ख्वाहिश मे, धार्मिक नेता बनने की ख्वाहिश मे लोगों को उकसा कर समाज को गुमराह कर देना है।
बस्ती मे मेरा एक दोस्त था रजी। हम छोटे थे तो हर त्योहारों मे एक दूसरे के यहाॅ आते जाते थे, कभी कभी घरवालों के विरोध के बावजूद। जब बड़े हुए तो हमने इतनी विवकेशीलता दिखायी, हम किसी भी धार्मिक परिचर्चा से समय रहते उठ जाते। लगभग हर साल मूर्तिविसर्जन को ले कर बवाल होता था, हम तब भी रात मे साथ घूम रहे होते थे, हमारे अन्दर इतनी आपसी समझ थी कि हमारी दोस्ती पहले है, ये कथित धर्म बाद मे, चाहे जो हो हम आपस मे नही लड़ने वाले।
मेरी बात आप को बुरी लग सकती है पर मै फिर भी कहॅूगा “ धर्म समाज के द्वारा, बचपन मे ही मासूम बच्चों को दिया जाने वाला धीमा जहर है, उनके विकास को रोकने का, उनकी आजादी छीनने का एक जरिया है। धर्म के नाम पर उन्हे डराया गया है, आस्था के नाम पर उनकी खोज करने की क्षमता को बाधित किया गया है। विज्ञान के तरफ जाने से रोका गया है। आज धर्म के नाम पर सिर्फ शोर मचाना रह गया है हम स्वयं, धर्म के बारे मे कुछ खोज नही करते, जानना नही चाहते और उसी मे अपनी नयी पीढ़ी को भी ढकेल दे रहे हैं। मेरे अनुसार धर्म की शिक्षा बच्चे को तब दिया जाना चाहिये जब वह समझने लायक हो जाये, वह खुद घोषणा करने लायक हो जाये कि उसे कोई धर्म चुनना है या नही, और यदि चुनना है तो कौन सा ? यह उसकी निजी राय हो आप द्वारा थोपी गयी नही।“

Saturday, 10 October 2015

भय से दो दो हाथ

fearful face
आज के आतंकी आई्रएसआईएस, चंगेज खाॅ की तुलना मे कुछ भी नही हैं। बताते हैं कि वह जिधर से निकलता था उधर के दस दस हजार बच्चों के सिर कटवा देता था, सिर्फ सिर कटवाता नही था बल्कि आतंक फैलाने के लिये उसके सैनिक उन मासूम बच्चों के सिरों को अपने भालों पर लगा कर लहराते हुये चलते थे। गाॅव के गाॅव मे आग लगवाते चलता था कि रात मे उसके सैनिकों को प्रकाश की कमी न होने पाये। उसके आतंक से गर्भवती महिलाओं को पूर्व प्रसव हो जाया करते थे।
इतना खूॅखार और दुष्ट व्यक्ति भी निर्भय नही था। वह अपनी मौत से बहुत भयभीत था। बताते हैं कि डर के मारे वह रात मे सोता ही नही था, उसे डर लगा रहता था कि रात मे यदि , मेरे सैनिक किसी कारण सो गये तो कोई तंबू मे घुस कर उसकी हत्या कर सकता है। इस लिये वह रात के बजाय दिन मे सोता था, जब उसके विश्वासपात्र सैनिक बाहर पहरा दे रहे होते।
भय सबको होता है और सबके भय अलग अलग हैं। कुछ भय आप को कई जन्मों से घेरे हैं और कुछ भय हमे हमारे माॅ बाप , हमे बचपन मे अपने निजी स्वार्थों की खातिर , उपहार मे, जीवन भर के लिये दे देते हैं। हमारे विभाग मे रमेश पान्डे जी हैं, उम्र लगभग 51 साल है, आज भी अगर 500 मीटर की दूरी पर हाथी हो तो, कोई भले न देख पाये, रमेश जी देख लेते हैं, और बच्चों जैसे भय से काॅपने लगते हैं, जगह देख कर छुप जाते हैं। बचपन मे जब शैतानी करते थे तो माॅ बाप हाथी से डराते थे। आज वह भय अवचेतन तक जा पहॅचा है। कुछ भय हम खुद ही कमाते हैं, जैसे यदि हमने किसी चीज के लिये प्रयास किया और फेल हो गये या हमने किसी को फेल होते देखा तो हम भयभीत हो जाते है, और यदि कई बार फेल हो जाॅये तो डर हमारे अन्र्तमन पर हावी हो जाता है और हमे प्रयास ही नही करने देता। कुछ डर पिछले जन्मों के भी होते ह,ै जो हमारा अवचेतन आज भी ग्रहण किये हुये है। जैसे किसी के पिछले जीवन मे आगजनी हुई और उसकी जल कर मृत्यु हो गयी, तो कुछ लोगों का अवचेतन मन वह घबराहट और पीड़ा, आग देख कर इस जीवन मे भी महसूस करता है, जब कि वह व्यक्ति खुद नही समझ पाता कि ऐसा क्यों हो रहा है ?
हम भय को दूर करने के लिये जो प्रयास करते हैं, वह ऐसे ही है जैसे बिना जड़ को मिटाय,े सोचें कि पीपल के वृक्ष को हम नष्ट कर ले जायेंगे। जैसे चंगेज खाॅ को ही लीजिये, उसे अपनी मौत का डर जैसे जैसे और सताता गया तो उसने क्या किया ? बिना भय के मूल नष्ट किये उसने अपना पहरा और बढ़ा लिया और सोचता रहा कि मै अब भय मुक्त हॅू, , जब कि वह अंदर ही अंदर इतना आतंकित हुआ कि, नींद मे भी उसे सपना आने लगा कि कोई उसकी हत्या करने आ गया, और एक दिन जब वह गहरी नींद मे था तो उसने सपना देखा कि दुश्मन उसकी तम्बू मे घुस रहे हैं, वह अपने बिस्तर से झटके से उठा और अपने तम्बू से बाहर भागा पर उसका पैर एक रस्सी मे फॅस गया और वह घबराहट मे मर गया।
कोई भी भय हो यदि वह हमारे अवचेतन तक पहॅुच गया है तो, उससे आप बाहर से लड़ कर जीत नही सकते, उल्टे वह धीरे धीरे एक फोबिया बनता जायेगा। यदि आप के पास ऐसा कोई बच्चा या वयस्क हो तो कोई बाहरी उपाय करने के पहले, प्यार से उसके अन्र्तमन मे जा कर असल वजह ढॅूढने की कोशिश करें, और बार बार सकारात्मक सुझाव दे कर भय को दूर करने का प्रयास करें। अच्छा हो यदि आप किसी प्रोफशनल हिप्नोटिस्ट से सम्पर्क करें। इतने तरह के भय और उन्हे दूर करने के उपाय हैं कि एक ही ब्लाग मे सब को शामिल कर पाना सम्भव नही है।
एक विशेष बात कभी भी, बचपन मे किसी मासूम बच्चे को, चाहे जो कारण हो डराने का काम न करें। यदि कोई कर रहा हो तो उसे रोके। आज का बच्चा यदि डरा रहेगा, तो कल हम और हमारी सीमायें असुरक्षित हो जायेंगे।

Monday, 5 October 2015

समाज की चिन्ता न करें


चिंतित हम सब होते हैं, कभी अपने भविष्य कोे ले कर, कभी अपने बच्चों के भविष्य को ले कर, कभी आपसी विवाद को ले कर। कभी कभी तो लोगों की चिन्तायें इतनी बढ़ जाती हैं कि नर्वस ब्रेकडाउन तक हो जाता है। परन्तु यदि हम गहरे मे सोचें तो हमारी अधिकतर चिन्तायें सिर्फ इस लिये होती हैं कि समाज क्या कहेगा ? पर जो समाज की चिन्ता किये बगैर काम करता है, जिसे अपने पर भरोसा होता है, उन्मुक्त भाव से काम करता है वही समाज को कुछ दे भी पाता है, वही एक मिसाल कायम कर पाता है, वही चिन्ता मुक्त और स्वस्थ भी रह पाता है। समाज का क्या है उसे तो कुछ न कुछ कहना ही है।
मैने सुना है कि एक पिता अपने बेटे और गघे को ले कर कहीं जा रहा था। उसने सोचा कि यदि हम दोनो गघे पर चढ़ जाते हैं तो लोग यही कहेंगे कि कि दोनो गधे पर चढ़ कर बेचारे गधे को मारे डाल रहे हैं इस लिये वह गधे और बेटे के साथ पैदल ही चल पड़ा। अभी वह थोड़ी ही दूर गया था कि रास्ते मे कुछ लोग मिले और कहने लगे “देखो ये कितने मूर्ख हैं गधा साथ है फिर भी पैदल चल रहे हैं।“ पिता ने सोचा कि अब क्या करूॅ, ऐसा करता हॅू कि बेटे को गधे पर बैठा देता हॅू नही तो लोग कहेंगे कि खुद गधे पर बैठा है और बेटा पैदल चल रहा है। अभी वह थोड़ी ही दूर जा पाया था कि रास्ते मे कुछ लोग और मिले और कहने लगे “देखो क्या जमाना आ गया है ? बच्चों ने तो माॅ बाप की कद्र करना ही छोड़ दिया है बेटा खुद गधे पर चढ़ा है और बाप पैदल चल रहा है।” पिता ने सोचा कि अब क्या करूॅ, ऐसा करता हॅू कि बेटे को गधे से उतार देता हॅू और खुद बैठ जाता हॅू। अभी वह थोड़ी ही दूर और जा पाया था कि रास्ते मे कुछ लोग फिर मिल गये और कहने लगे “देखो क्या जमाना आ गया है बाप को तो सिर्फ अपनी फिकर है, खुद गधे पर बैठा है, मासूम बेटा पैदल चल रहा है ? अब वह गुस्से के मारे खुद भी बैठ गया और बेटे को भी बैठा रहने दिया। पर लोग कहाॅ मानने वाले, बेचारा जैसे ही थोड़ा आगे गया पीछे से चिल्लाने लगे ” तुम सब कितने मूर्ख हो निर्दयी हो बेचारे गधे की जान ले लोगे क्या ?“
उसने गुस्से और अवसाद मे गधे को पुल से नीचे धक्का दे दिया और घर वापस आ गया। लोग तब भी कहाॅ पीछा छोड़ने वाले, पूरा गाॅव इकट्ठा हो गया और सब उसे बुद्धू कहने लगे। पीछे से कोई चिल्लाया “लौट के बुद्धू घर को आये।”
तो जो समाज की ज्यादा चिन्ता करता ह्रै लोग उसे बुद्धू ही करार देते हैं, इस लिये यदि आप को लगता है कि आप सही कर रहे हैं, कोई अनैतिक काम नही कर रहे हैं तो समाज की चिन्ता किये बगैर अपने मिशन पर कायम रहें। चिन्ता मुक्त रह कर स्वस्थ जीवन जीयें।

Monday, 28 September 2015

आकाक्षांये अनन्त हैं।

एक राजा यूॅ ही एक दिन, मन किया और बिना फौज फाटे के घूमने निकल लिया। कुछ दूर जाने के बाद, एक गाॅव के बाहर एक बुढि़या हाथ मे एक पात्र लिये खड़ी थी और उस पात्र से कुछ बुदबुदा रही थी। राजा कुतूहल बस वहाॅ रूक गया, और बुढि़या को देखने लगा। बुढि़या के पात्र और व्यवहार दोनो ही अजीब थे। राजा को देख कर बुढि़या ने अपना सिर ऊपर उठाया और राजा की तरफ प्रश्नवाचक निगाहों से देखा। राजा ने कहा “ये तुम्हारे हाथ मे कैसा अजीब पात्र है? और तुम यहाॅ क्या कर रही हो ?“ बुढि़या ने कहा “मेरे हाथ मे ये भिक्षा पात्र है, जिसे आज तक कोई भर नही पाया है, मेरे भी मरने के दिन नजदीक हैं और मै यहाॅ खड़ी हो कर अपने पति को बता रही थी कि मुझे भी खाली हाथ ही मरना पड़ेगा, ये पात्र कोई भर नही पायेगा।“ राजा को बड़ा विस्मय हुआ उसने बुढि़या से कहा “कि ये तेरा छोटा सा तो पात्र है, कैसे नही भरेगा ? तू सही जगह माॅगने नही गयी होगी। मै यहाॅ का राजा हॅू तू कल सूर्योदय होते ही मेरे महल के बाहर आ जाना, मै प्रातः भ्रमण को जाते समय तेरा पात्र हीरे मोतियों से भर दॅूगा।“ बुढि़या ने कहा “महाराज एक बार और सोच लीजिये मै कल आखिरी बार भिक्षाटन को निकलॅूगी और खाली पात्र के साथ वापस न आ सकूूॅगी, या तो भरे पात्र के साथ आऊॅगी या फिर वहीं मर जाऊॅगी।“ राजा ने कहा ”इसमे सोचने जैसा कुछ नही है, तुम कल आ जाना।”
राजा के लिये किसी भिखारी को भिक्षा देना छोटी मोटी बात थी, वह महल गया, दिन भर अपना काम काज किया और अपना वादा भूल भी गया और आराम से सो गया। सुबह वह पा्रतः भ्रमण के लिये महल के बाहर कदम ही रखा था वह बुढि़या राजा को नजर आ गयी, साथ ही उसको दिया गया अपना वादा भी। उसने एक चाकर को को भेज कर खजाॅची को बुला लिया और बोला ” इस बुढि़या का भिक्षा पात्र अशर्फियों से भर दो।”
राजा जब भ्रमण से लौटा तो देखा उसके महल के बाहर पूरी भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी। सारे दरबारी भी आ चुके थे और बुढि़या को वापस जाने को मना रहे थे, पर उसकी जिद थी कि वह भरा पात्र ही ले कर जायेगी, राजा ने उससे वादा किया है। राजा ने दरबारियों से पूछा ”क्या मेरा खजाना खाली हो गया है जो तुम लोगों ने इतना तमाशा बना दिया है ?” खजाॅची ने कहा ”महाराज आप अपना वादा तोड़ दीजिये नही तो सचमुच खजाना खाली हो जायेगा, इसके पात्र मे चाहे जितना डालता हॅू वह कुछ न कुछ खाली ही रह जा रहा है।” राजा ने ”कहा मेरे सामने भरो मै भी देखता हॅू।” राजा अपनी जिद की वजह से दोपहर तक कंगाल हो गया। सब कुछ उस पात्र मे डाला जा चुका था, पर उसका कुछ भाग अभी भी खाली था।
राजा अब परास्त हो चुका था। उसने बुढि़या के पैरों मे अपना सिर रख दिया और बोला ”मै राजा होने के अहंकार मे इसे भरने की कोशिश करता रहा, पर मै अब हार गया। मुझे अफसोस है कि मै अपना वादा नही पूरी कर पाया, पर ये तो बता दो कि इस पात्र का क्या राज है ?
बुढि़या ने कहा ”ये पात्र नही मेरे पति की खोपड़ी है, जो रात दिन पैसा पैसा करते, दिन रात मेहनत करते करते, समय से पहले चल बसा। उसकी याद सदैव बनी रहे इस लिये उसकी खोपड़ी मैने अपने पास रख ली, और अब उसी मे भिक्षा माॅग रही हॅू।”
राजा को समझ आ चुका था कि मानव की खोपड़ी ही ऐसी है, उसकी इच्छायें इतनी अनन्त हैं कि चाहे पूरी प्थ्वी की दौलत इसमे डाल दी जाये पर ये सन्तुष्ट कभी नही होगी, कभी नही भरेगी।

Sunday, 27 September 2015

सब से खतरनाक रोग

वो मेरा सबसे अच्छा दोस्त था, उसके पिता टीचर थे, और ये उनकी एक मात्र सन्तान थी। हमारे उसके नम्बर लगभग बराबर आते थे, जब हम थोड़े और ऊपर के क्लास मे गये तो अंकल ने उसके मन मे ये भरना शुरू कर दिया कि ”हर काम मे एक नमबर आना जरूरी है।“ अब वो मेरे साथ खेलने भी नही जाता था क्यों कि उसे हमेशा नम्बर एक की तैयारी जो करनी रहती थी। क्लास मे सबसे पहले आना, टीचर कुछ भी पूछे तो सबसे पहले जबाब देना, फिर सबसे पहले वापस अपने घर पहॅुच जाना। चैदह साल की उम्र तक आते आते अंकल उस के ऊपर पूरी तरह छा गये थे। रात मे दस ग्यारह बजे तक पढ़ाई करना, सबेरे पाॅच बजे उठना, पढ़ना, जागिंग, एक्सरसाइज और फिर स्कूल। रात दिन नम्बर एक के सुझावों से वह, नम्बर एक के प्रति सम्मोहित हो चुका था। अब वाकई हर क्षेत्र मे उसके रिजल्ट भी नम्बर एक आना शुरू हो गये थे, लेकिन मैने अंकल को देखा तब भी वो हर दम किसी न किसी से उसकी तुलना करते ही रहते थे और, उसे और अच्छा करने के लिये डाॅटते रहते थे।
हम इन्टरमीडियेट मे पहुॅच गये थे, मै अक्सर अपने सबसे अच्छे दोस्त से बात करने का मौका ढूॅढते रहता था पर हम लोग ज्यादा बात नही कर पाते थे, पर उस दिन वह मुझसे खुद मिलने आया और बताया कि वह कल अपने मामा की बेटी की शादी मे जा रहा है। वह वाकई मे बहुत उत्तेजित था। सालों बाद मैने उसके चेहरे पर गजब की खुशी देखी थी। पर कौन जानता है कि कल के गर्भ मे क्या है ? कल हम मिले लेकिन जिला अस्पताल मे। नम्बर एक की आदत ने उसे सबसे आखिर की लाइन मे खड़ा कर दिया था जहाॅ से न कोई आगे जा सकता था न ही पीछे। सबसे पहले Train मै पकड़ लॅू, इस इच्छा से वह Train रूकने के पहले ही Train मे घुसने लगा था, पर उसका पैर स्लिप कर गया था। उसका पैर Train के पहियों के नीचे आ कर कट गया था। खून ज्यादा बहने के कारण और पैर मे इन्फेक्शन फैल जाने के कारण डाक्टर उसे बचा न सके थे।
जब मै उससे मिलने गया तो उसे समय बड़ा ही दर्दनाक मंजर हो गया था। वह मेरा पैर पकड़ने की कोशिश करने लगा था “बचा ले मेरे दोस्त, मुझे तुझसे बहुत सी बातें करनी है, तेरे साथ खेलना है।” अंकल इधर उधर पागलों की तरह भाग रहे थे उनकी जुबान पर बस एक ही रट थी ”हे परमात्मा बचा ले मेरे बेटे को , नही चाहिये मुझे नम्बर एक, मुझे बस मेरा बेटा वापस कर दे।“ पर अब शायद बहुत देर हो चुकी थी, थोड़ी ही देर मे नम्बर एक, नम्बर जीरो बन गया था।
बहुत बाद मे सुनने को मिला कि अण्टी ने दुख और अवसाद मे अंकल से तलाक ले लिया और जल्दी ही चल बसीं।
समाज का सबसे खतरनाक रोग जानते है क्या है ? रेस, उन चीजों के लिये जो अपने पास नही है। अपनी 75 प्रतिशत नियामतों के लिये परमात्मा को धन्यवाद न दे कर उन 25 प्रतिशत भाग के लिये रोना, चिन्तित होना जो अपने पास नही है, और यही सारे रोगों का जड़ है। छोड़ दीजिये 25 प्रतिशत के लिये रोना, भागना और मनाना शुरू कर दीजिये 75 प्रतिशत का जश्न और देखिये आप के जीवन से रोग भाग जाते हैं कि नही। बन्द कर दीजिये परमात्मा को, माॅ बाप को , समाज को कोसना, उन्हे उनकी अज्ञानता के लिये क्षमा कर दीजिये और सीख लीजिये दिल से खुश रहना और फिर देखिये फर्क पड़ता है कि नही। अपने को 75 प्रतिशत खुशी देना शुरू करिये, बाकी के 25 प्रतिशत खुशी ख्ुाद चल कर आप के पास आ जायेंगे। यही नियम है, और ये कभी गलत नही होता।

Saturday, 26 September 2015

आप की चिन्तायें व्यर्थ हैं


हम सब चिन्तित होते हैं। चिन्तायें स्वाभाविक भी हैं, लकिन यदि आप चाहते हैं कि आप का आने वाला कल एक दम बेहतरीन हो तो इसके लिये जो सबसे बढि़या तरीका है वह ये है कि आप अपनी सारी युक्ति आज के काम को बेहतरीन बनाने मे लगा दें, आज खुश रहने मे लगा दें। कल छुपा है आज के पेट मे। आज ठीक है तो कल भी ठीक रहेगा, लेकिन आज आप, कल के लिये चिन्तित हो कर, कल को ठीक करना चाहते हैं, सुधारना चाहते हैं तो कल कभी नही सुधार पायेंगे क्यों कि हर दिन आप यही सोचते हैं कि कल खुश हो लूॅगा, और वो कल कभी नही आता है। आप के चिन्ता करने से कोई चीज समय से पहले आप को मिल गयी है  या आप के चिन्ता करने से कोई दुर्घटना टल गयी ? नही न, फिर इसी लिये मै एक बार और कहता हॅू, आप का चिन्ता करना बेकार है, आप के सेहत के साथ खिलवाड, है। उन चीजों का आनन्द लीजिये जो अभी आप के पास है, तभी हमारा दाता ये समझ पाता है कि यह बन्दा खुश रहता है इसके जीवन मे ऐसी परिस्थितियाॅ पैदा करो कि ये खुश ही रहे, इसकी यही चाहत है। जब कोई बर्तमान मे रोता ही रहता है, तब हमारा दाता ये समझता है कि इसकी यही चाहत है, इसके जीवन मे ऐसी ही परिस्थितियाॅ रहने दो। जो आप सोचते हैं जो आप करते हैं, उसी के अनुरूप आप के जीवन का निर्माण होता रहता है।
जब ला आफ अट्रैक्शन  कहता है कि इस दुनिया मे हर चीज प्रचुर मात्रा मे है तो हम मानते ही नही और अपनी गणित लगा लगा कर सदैव बेचैन और चिन्तित होते रहते है। प्रकृति ने आप के चिन्तित होने के लिये कोई वजह नही छोड़ा है, लेकिन आपको दुखी होने का, गुस्सा करने का, चिन्तित होने का, कोई न कोई बहाना मिल ही जाता है। आप दुख दर्शी हैं, इस लिये आप को गुलाब की खुबसूरती, बच्चों की मधुर मुस्कान, प्रकृति की सुन्दर मनमोहक शाम, लहलहाते खेत इन सब मे भी आप को सुख नही नजर आता है। जवान जवान बच्चों के चेहरों की मुर्दानगी और झुर्रियाॅ उनके जीवन के सघंर्ष को बयान कर देती है। कहाॅ है उनके जीवन मे आनन्द, और मस्ती ? पर मै अब भी कहता हॅू आप कल की चिन्ता छोड़ दीजिये, सुकरात कहता है ”कल का कोई विचार मत करो क्यों कि कल अपना विचार खुद कर लेगा।“
अब सूरज की किरणों से तरल ईंधन बनाया जा सकेगा, ऐसा सफल प्रयास हावर्ड मेडिकल स्कूल की पामेला रजत नामक रसायनशास्त्री ने किया है। हाॅलाकि अभी इसकी दक्षता 1 प्रतिशत है पर भविष्य मे 5 प्रतिशत तक ले जाने की सम्भावना है। अगर ऐसा हो पाया तो तो हम मुफ्त मिलने वाले अथाह सूरज की किरणों को उसके दूसरे फार्म मे, एक तरह से स्टोर कर सकेंगे। आने वाले ऊर्जा संकट का बहुत सा भाग हल हो सकेगा। इसी लिये मै कहता हॅू कि चिन्ता करने का काम प्रकृति पर छोड़ दीजिये, आप की जरूरत  पर प्रकृति आप को वह रास्ता दिखा देगी, कि आप अपनी जरूरत की चीज ढूॅढ लेंगे। आप देखो न,  प्रकृति मे मौजूद तो हर चीज थी लेकिन वह तब आप को मिली, जब आप उस के लायक बन सके, हर आपकी जरूरत की चीज क्रमशः आप को मिलती जा रही है। सारे आविष्कार क्रमशः हो रहे हैं। जो पूरी सृष्टि की चिन्ता कर रहा है उसे आप की भी चिन्ता है और ये काम वह हमसे आपसे बेहतर कर सकता है, तो अच्छा हो हम ये काम उसे ही करने दें।

Friday, 25 September 2015

मृत्यु का भय आधारहीन है।

कहते हैं सिकन्दर को एक ऐसे झरने की तलाश थी जिसका पानी पीने से आदमी कभी मर नही सकता। एक दिन उसकी तलाश पूरी हो गयी। उसने अपने फौज को झरने के बाहर इन्तजार करने को बोला और खुद उस गुफा मे घुस गया जिसके अन्दर वह झरना था। गुफा के अन्दर थोड़ी दूर और जाने पर वातावरण बदलता मालूम हुआ, उसके अन्दर एक अजीब सी प्रसन्नता का संचार होने लगा और तभी सामने उसे एक खूबसूरत झरना दिखायी दे गया। उसके पूरी शरीर मे खुशी से रोमांच हो आया, आॅखों मे आॅसू आ गये, उसकी बरसों की खोज पूरी हो रही थी। उसके कदमों की रफ्तार तेज हो गयी, वह जल्दी से झरने तक पहॅुच कर उसका पानी पी लेना चाहता था। वह झरने के नीचे पहॅुच गया, हाथ बढ़ाया और तभी उसे एक आवाज सुनायी दी “ रूको ”, सिकन्दर पीछे घूमा पर उसे कोई दिखायी न दिया। वह फिर झरने की तरफ हाथ बढ़ाया और तभी फिर उसे एक कराहती आवाज सुनायी दी “ तुम झरने तक आ गये हो तो जल्दी क्या है ? पानी तो पी ही लोगे पर क्या ये नही जानना चाहोगे कि पानी, पीने से और क्या होगा ?” सिकन्दर फिर उस आवाज की तरफ बढ़ गया, नजदीक गया तो एक बूढ़ा कौवा उसे दिखायी दिया जो जमीन पर पड़ा था पर उसकी हालत बहुत खराब थी। कौवे ने कहा “ हाॅ मैने ही तुम्हे आवाज दी थी, मेरी इस हालत का जिम्मेदार ये झरना है। मैने इसका पानी पीया था, मेरी उम्र पाॅच सौ वर्ष हो चुकी है। मैने अपनी आॅखों के सामने अपनी पत्नी, बच्चों और कितनी पीढि़यों को मरते देख चुका हॅू। सिकन्दर मै मरना चाहता हॅू, पर कोई उपाय नही है। मै क्यों जिन्दा रहॅू ? मै अपने निजी काम भी नही कर सकता, मै अपने लिये भोजन तक नही ढूॅढ सकता, मेरा कोई भी अंग काम नही कर रहा है। मै बिना भोजन के कई कई दिनों तक पड़ा रहता हॅू, परिवार के सदस्यों ने मुझे पुराना खर्चीला कूड़ा करार दे कर घर से बाहर कर दिया है। मै उड़ नही सकता मै हर मौसम की मार यॅही पड़े पड़े सहता रहता हॅू। कभी किसी राहगीर पंछी को यदि मेरी हालत पर तरस आयी तो उसकी दया पर कभी कभी मुझे भोजन नसीब हो जाता है। सिकन्दर मै फिर से बचपन और जवानी जीना चाहता हॅू, अपना परिवार बनाना चाहता हॅू। पर जब तक मरूॅगा नही मुझे कुछ नही मिलेगा। अब अगर तुम पानी पीना चाहते हो तो उधर है झरना जिसका पानी पीने के बाद तुम अमर हो जाओगे।“ सिकन्दर को उस खुशनुमा वातावरण मे भी पसीना हो आया, वह वहाॅ से बहुत जल्दी बाहर हो जाना चाहता था। वह बाहर आया, घोड़े पर बैठा और अपने फौज के साथ अपने विजय यात्रा पर निकल गया।
प्रकुति की व्यवस्था तो देखिये, जीवन के पश्चात् मृत्यु एक विश्राम है, जैसे आदमी दिन भर काम के थकान के बाद रात का विश्राम लेता है। असल मे दिन का मजा भी तभी है जब रात हो विश्राम के लिये, शान्ति के लिये। हर चीज का एक दूसरा छोर है, बिना विपरीत छोर के किसी भी चीज का अस्तित्व हो नही सकता जैसे ऊपर है तो नीचे है, दाॅया बाॅया, धरती आसमान, ठंडा गरम, सुख दुख, तो जीवन की कल्पना आप बिना मृत्यु के कैसे कर सकते हैं ? नया जीवन, नया बचपन, नयी जवानी, नया साथी पाने के लिये पुराने का परित्याग आप को करना ही होगा। थोड़ा और गहराई से सोचेंगे तो मृत्यु के भय से आप मुक्त हो जायेंगे, यह भय नया जीवन पाने की खुशी मे बदल जायेगा और मृत्यु का भय आपको आधारहीन लगने लगेगा।
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Thursday, 24 September 2015

समस्या का हल

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इस दुनिया मे समस्या को लोग दो तरह से सुलझाते हैं, एक तो समस्या की जड़ को जस का तस छोड़ कर ऊपर से टहनियों और पत्तों को काट काट कर सोचते हैं कि समस्या सुलझ रही है, और हममे से लगभग लोग यही कर रहे है।ं दूसरे कुछ लोग वे होते हैं जो पत्ते और टहनियों के बजाय सीधा जड़ को ही खोदकर फेंक देते हैं।
हम सोचते हैं ज्यादा पैसा हो जायेगा तो समस्या सुलझ जायेगी, सारे सुख सुविधा के संसाधन हो जायेंगे तो समस्या सुलझ जायेगी। पर असल मे ऐसा हुआ है क्या ? नही, उल्टे ही मानव पहले से ज्यादा दुखी हुआ है, उसकी शान्ति कम होती गयी है। इसी तरह हमारी व्यक्तिगत समस्यायें भी है, वे सुलझने के बजाय और उलझती गयीं हैं, क्यों कि हमने समस्या को जड़ से खत्म करने के बजाय, सारा ध्यान पत्तो और टहनियों पर दिया। एक समस्या को सुलझाने के लिये दूसरी खड़ी करते गये। हम सुखी होने के बजाय दुखी होते गये।
दुख से निपटने का एक ही तरीका है, आपको तादात्म्य छोड़ना पड़ेगा। आदमी अपनी बुद्धि से कहीे पहुॅचने के बजाय अपने ही जाल मे उलझ गया है। उसे प्रकृति पर भरोसा ही नही है। इस पूरी सृष्टि मे मानव ही ऐसा है जिसे प्रकृति से ज्यादा भरोसा अपनी बुद्धि पर है, और यही उसकी समस्या है।
एक प्रयोग करें, जब आप कहीं उलझ जाॅयें, आप को अपनी समस्या का हल न मिल रहा हो तो आप अपनी बुद्धि को छोड़ दें, रिलैक्स हो जाॅये जैसे कुछ हुआ ही न हो और प्रकृति को अपना काम करने दें। उस प्रकृति को जो पूरी दुनिया को सामंजस्य मे रखे हुये है। आपको छोड़ कर इस सृष्टि मे सारे जानवर, पेड,़ पौधे और कीड़े मकोड़े समस्या से मुक्त हैं। जिस दिन आप प्रकृति के हवाले अपने आप को कर देते हैं, बुद्धि को छोड़ देते हैं, आप सहज हो जाते हैं और शनैः शनैः आप को समस्या का हल मिल जाता है।

Wednesday, 23 September 2015

ध्यान की सबसे आसान विधि

ध्यान कुछ करने की चीज नही है, यह सिर्फ न करने की चीज है। आराम से जिस भी मुद्रा मे सुख पूर्वक बैठ सकते हों, बैठें और कोशिश करें कि रीढ़ एक दम सीधा रखें। आॅख बन्द कर लें, साॅसों पर ध्यान दें। जितनी देर आप साॅसों पर ध्यान दे पायेगे, आप देखेंगे कि आप बाकी चीज भूल गये हैं। सिर्फ साॅसों पर ध्यान करते करते कुछ दिन बाद आप पायेंगे कि आप अन्दर सरकने लगे हैं। फिर अन्दर सरकते सरकते कुछ दिन बाद आप अपने को देख सकेंगे, अपने को जान लेंगे और फिर आप ब्रह्म को जान लेंगे।
विपश्यना ध्यान
ध्यान की और बहुत सारी विधियाॅ हैं उनमे विपस्सना ध्यान का अपना महत्व है। ये पूर्णतया वैज्ञानिक है। लगभग 2500 वर्ष पहले इस विधि को भगवान बुद्ध ने पुनः सर्वसुलभ बनाया। यह सब के लिये कल्याणकारी है, इसे कोई भी कर सकता है। इस विधि मे इस बात की खेज है कि आखिर मै हॅू कौन ? इस विधि से साधना करने पर साधक को यह स्पष्ट दिखने लगता है कि यह शरीर सिर्फ लगातार उत्पन्न और व्यय होने वाला तरंग मात्र है। जितनी भी बस्तुयें, घटनायें, स्थिति या व्यक्ति हैं वे सब मरणधर्मा हैं। सब क्षणभंगुर, नश्वर और परिवर्तनशील हैं। इस क्षण प्रतिक्षण् परिवर्तनशील धारा को निरासक्त भाव से देखना ही विपश्यना है।

TENSION....NEVER: हमें बख्श दें

TENSION....NEVER: हमें बख्श दें: परमात्मा इतना विशाल है कि  वह आप के किसी मूर्ति, फोटो, आकार, मंदिर , मस्जिद या गिरिजा में नहीं समां सकता। वह विशाल से भी विशाल और छुद्र से ...

हमें बख्श दें

परमात्मा इतना विशाल है कि  वह आप के किसी मूर्ति, फोटो, आकार, मंदिर , मस्जिद या गिरिजा में नहीं समां सकता। वह विशाल से भी विशाल और छुद्र से भी छुद्र है।  विशाल इतना है कि इस पृथ्वी जैसे पचास हजार से ज्यादा पृथ्वी मैनेज कर रहा है जैसा कि  हमारे वैज्ञानिक बताते हैं,  और छोटा इतना है की अंत में गायब हो जाता है,  हमारे वैज्ञानिकों  कीं पहुँच से बहुत दूर हो जाता है। लेकिन दुनिया तब भी चलती रहती है। इसी लिए आज तक कोई नहीं समझ पाया कि दुनिया बनी किससे  है , और इसका परिचालन कैसे हो रहा है , कौन कर रहा है ? अब ऐसे में अगर आप परमात्मा को कोई आकार देते हैं या कोई सीमा प्रदान करते हैं तो ये हमारी आपकी लघु तम मानसिकता के अलावा कुछ नहीं है। परमात्मा को कोई समझा नहीं पाया , क्यों कि परमात्मा कोई समझाने की चीज भी नहीं है , परमात्मा को सिर्फ महसूस किया जा सकता है। परमात्मा हमारे आस पास हर जगह है।  असल में सब कुछ परमात्मा ही है , बिना परमात्मा के कुछ भी सम्भव ही नहीं है। दृश्य अदृश्य में उपस्थित हर चीज अपना धर्म इस लिए दिखा पाता है कि उसके अंदर परमात्मा का वास होता है। हम सब परमात्मा के अंदर ही वास करते हैं और परमात्मा हमारे एक एक रोम में वास करता है। परमात्मा सबसे बड़ा वैज्ञानिक है वह अपने अंदर बहुत से रहस्य छुपा रखा है। जब हमारे वैज्ञानिक कुछ खोज करते हैं तो वे अलग से कुछ पैदा नहीं करते हैं , बल्कि प्रकृति के गर्भ में छुपे अनंत रहस्यों से कुछ की झलक पा जाते हैं। इसी लिए मैं कहता हूँ कि हमारी आपकी हैसियत नहीं है उसे सीमा प्रदान करें ।  उसके लिए लड़ें , एक दूसरे की हत्या करें  ? किस भगवान ने कहा , किस अल्लाह ने किस जीसस ने दूसरे को धर्म विरोधी कहने को कहा ? असल में लड़ने का मन हमारा आप का है , धर्म  तो एक बहाना है। लड़ना हमारे स्वाभाव में है।  हम पैदा ही लड़ते लड़ते हुए हैं।  हमारा विकास ही जानवर से हुआ है , और हमारी पाशविकता अभी गयी नहीं है।  जब लोग लड़ रहे हों उनके चेहरों को ध्यान से देखिये किन्ही लड़ते कुत्तो जैसे शक्ल रहती है या नहीं , किसी अकेली लड़की को अकेले में मिलने पर अपने को देखे पाशविकता पैदा होती है की नहीं ? हमारे लड़ने से न तो परमात्मा को दुःख होता है न ही प्रसन्नता , उसे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता है, परन्तु हमें फर्क पड़ता है। परमात्मा तो अनंत है अथाह है अबूझ है , इसी लिए इस जगत को हिन्दू माया कहते हैं। हमारे आपके लड़ने से परमात्मा को नहीं , हमें फर्क पड़ता है।
समुद्र के तेज लहरों से बहुत सी छोटी छोटी मछलियाँ बाहर आ कर तड़प रही थी , एक व्यक्ति एक एक मछली को उठा कर वापस समुद्र में फेंक दे रहा था , दूसरे व्यक्ति ने कहा तुम्हारे एक एक  मछली को वापस समुद्र में फेकने से समुद्र को क्या फर्क पड़ेगा ? उस आदमी ने बहुत ही अछा जवाब दिया समुद्र को तो नहीं पर,  उस मछली पर जरूर फर्क पड़ेगा जिसको जीवन दान मिल गया है। हे धर्म के ठेके दारों हमें जीने दो , आप के लड़ने से हमारी दुनिया तबाह हो रही है।  आप हमारे परमात्मा को खुश करने का ठेका बंद कर दे।  हम अपने अपने परमात्मा को अपने अपने तरीके से खुश कर लेंगे। आप हमें बख्श दें , आप की बड़ी मेहरबानी होगी। 

Monday, 21 September 2015

I am not owner

पैदा होना,  बड़ा होना,  जीवन  भर पैसे के लिए संघर्ष करना, बाहरी दुनिया में ऐशो आराम के संसाधन जुटाना,  बच्चों को बड़ा करना, पढ़ाना लिखाना , बूढ़ा हो जाना फिर घिसट घिसट कर मर जाना।  क्या यही है जीवन ? क्या यही लक्ष्य है जीवन का ? क्या यही चरम उद्देश्य है जीवन का ? यह सवाल हम सब के जेहन में कभी न कभी जरूर आता है।  किसी को पहले आ  जाता है , किसी को बाद में आता  है , किसी को कभी नहीं आता  है , आता  भी है तो वह उसे व्यर्थ का सवाल मान कर जीवन भर झुठलाते रह जाता है, और अपने काम में लगा रह जाता है , या फिर मंदिर मस्जिद गिरिजा जा कर अपनी धार्मिकता दिखा आता है। 
एक बार भगवान बुद्ध के पास एक अमीर आदमी आया उसने कहा मेरे पास अथाह सम्पत्ति है , मुझे लोगो पर बड़ी दया आती है , मै लोगो की सेवा करना चाहता हूँ , उन्हें कुछ देना चाहता हूँ। कहते है  भगवान बुद्ध काफी देर तक उसको दया भाव से देखते रहे और फिर उनकी आँखों में आँसू  आ  गए।  वह आदमी घबरा गया उसने कहा क्या बात है महाराज ? ऐसा क्या अपने मुझ में देखा कि आपकी आँखों में आँसू आ गए ?  भगवान बुद्ध ने कहा तुम दुसरो पर दया करने चले हो मुझे तुम पर दया आ  रही है ? जब अभी तक तुम्हे अपने पर दया नहीं आई है तो तुम दूसरे पर कैसे दया करोगे ? तुम पहले अपने पर तो दया कर लो। तुम जिस संपत्ति को अपना बता रहे हो , जिस पर तुम्हे अहंकार है वह संपत्ति तो तो असल में तुम्हारी है ही नहीं , क्या तुम उस संपत्ति को अपने साथ ले जा पाओगे ? जो संपत्ति तुम ले जा सकते हो वह तो तुम्हारे पास जरा भी नहीं है तुम तो निरे कंगाल हो इस लिए तुम्हे देख कर मेरे आँखों में आँसू  आ गए। असल में तुम्हारे पास संपत्ति तो है पर तुम्हे उसका पता नहीं है और तुम उस पर अपने अहंकार , स्वार्थ और चालबाजियों से इतनी मिटटी डाल  चुके हो की वह तुम्हे नजर ही नहीं आ  आ सकता। वह अथाह संपत्ति तुम्हारे पास थी और तुम जीवन भर छुद्र के पीछे भागते रहे।  चेतना को जगाओ और जो तुम जो  साम्राज्य ले कर पैदा हुए थे उसके मालिक बन जाओ। 
असल में हम सब इसी तरह हैं , हम पूरी दुनिया पा लेना चाहते हैं और इस चक्कर अपने को भूलते जाते हैं , कभी अपनी तरफ आना ही नहीं चाहते , अपने को जानना ही नहीं चाहते , अपने लिए समय ही नहीं है।  पूरा जीवन लगा देते है अपने बाद संपत्ति छोड़ जाने के लिए। जो अपनी आतंरिक संपत्ति पा लेता है उसी का जीवन सफल हो पता है।