
सारे धर्म कहते हैं प्रेम करो पर क्या आप को लगता है कि, किसी धर्म मे प्रेम बचा है ? धर्म की आड़ मे जितनी क्रूरता पूर्ण हत्यायें हुई हैं उतनी शायद और किसी कारणों से हुई हो। फिर कैसा प्रेम ? हम धर्म की बातें चाहे जितनी कर लें , पर असल मे हमारे अन्तस्तल मे तो बम है, जानवर है, जरा सी किसी ने हमारे धर्म के विरोध मे कहा कि हमारा विस्फोट हो जाता है। धर्म चाहे जो हो पर अगर वो हमारा अन्तस्तल परिवर्तित न कर सके, हमे सही मार्ग न दे सके तो वह दो कौड़ी का है, वह सिर्फ समय और धन का दुरूपयोग है। धर्म का सहारा मानव सभ्यता को विकसित करने के लिये होना चाहिये, न कि लड़ाने और तोड़ने के लिये। धर्म कोई भी बुरा नही है, बुराई है उसे अपने मतलब के लिये इस्तेमाल करना। दंगे और कुछ नही, अपने पीछे भीड़ जमा करने की ख्वाहिश मे, धार्मिक नेता बनने की ख्वाहिश मे लोगों को उकसा कर समाज को गुमराह कर देना है।
बस्ती मे मेरा एक दोस्त था रजी। हम छोटे थे तो हर त्योहारों मे एक दूसरे के यहाॅ आते जाते थे, कभी कभी घरवालों के विरोध के बावजूद। जब बड़े हुए तो हमने इतनी विवकेशीलता दिखायी, हम किसी भी धार्मिक परिचर्चा से समय रहते उठ जाते। लगभग हर साल मूर्तिविसर्जन को ले कर बवाल होता था, हम तब भी रात मे साथ घूम रहे होते थे, हमारे अन्दर इतनी आपसी समझ थी कि हमारी दोस्ती पहले है, ये कथित धर्म बाद मे, चाहे जो हो हम आपस मे नही लड़ने वाले।
मेरी बात आप को बुरी लग सकती है पर मै फिर भी कहॅूगा “ धर्म समाज के द्वारा, बचपन मे ही मासूम बच्चों को दिया जाने वाला धीमा जहर है, उनके विकास को रोकने का, उनकी आजादी छीनने का एक जरिया है। धर्म के नाम पर उन्हे डराया गया है, आस्था के नाम पर उनकी खोज करने की क्षमता को बाधित किया गया है। विज्ञान के तरफ जाने से रोका गया है। आज धर्म के नाम पर सिर्फ शोर मचाना रह गया है हम स्वयं, धर्म के बारे मे कुछ खोज नही करते, जानना नही चाहते और उसी मे अपनी नयी पीढ़ी को भी ढकेल दे रहे हैं। मेरे अनुसार धर्म की शिक्षा बच्चे को तब दिया जाना चाहिये जब वह समझने लायक हो जाये, वह खुद घोषणा करने लायक हो जाये कि उसे कोई धर्म चुनना है या नही, और यदि चुनना है तो कौन सा ? यह उसकी निजी राय हो आप द्वारा थोपी गयी नही।“
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