Friday, 30 October 2015

GEETA PART 2 , गीता अंक 2,


 महाभारत या धर्म की अनदेखी  
स्वयं पाप न करना, परन्तु पाप कर्म होते हुये देखना या उसमे मूक सहमति देना, पाप करने से ज्यादा वीभ्त्सकारी है, इस बात का प्रमाण है महाभारत का युद्ध।
कुरूवंश मे धर्म का पालन होता था, इसी लिये युद्धभूमि जैसी जगह को भी धर्मभूमि की संज्ञा दी गयी थी, यानि युद्ध कर्म को भी धर्म समझा जाता था। धृतराष्ट्र ने पुत्र मोह मे उस समय मुॅह नही खोला या दुर्योधन को नही रोका जब  उसने भीम को जहर दे कर जल मे प्रवाहित कर दिया,  जब उसने, पाण्डवों को उस समय लाक्षगृह मे जलाने की कोशिश की, जब कि वे बेचारे शर्त को मानते हुये अज्ञात वास पर थे।  धृतराष्ट्र ने उस समय भी मुॅह नही खोला जब दुर्योधन ने जुये मे शकुनि के साथ मिल कर, दुर्योधन के साथ छल किया और भरी सभा मे द्रौपदी को नग्न करने की कोशिश की। यदि धृतराष्ट्र समय रहते धर्म के पक्ष मे मॅुह खोलते और अपने पुत्रों को रोकते तो भी शायद यह युद्ध न होता, पर अपने पुत्र को राजा बनाने की इच्छा उन्हे मौन धारण करने हेतु प्रेरित किया।
 इस बात का दुख माता कुन्ती को भी था कि वे सब आपस लड़ते मरते, कुछ भी करते पर बीच मे अपने अहंकार के कारण द्रौपदी को नंगा करने की कोशिश गलत था, इतना ही नही माता कुन्ती को इस बात का भी अत्यधिक क्लेश था कि जब भगवान कृष्ण संधि प्रस्ताव ले कर हस्तिनापुर गये तो दुर्योधन के मित्रों ने कृष्ण को बन्दी बनाने की कोशिश की।
  महाराज युधिष्ठर को धर्मराज कहा जाता था , उनकी इच्छा कदापि नही थी कि युद्ध हो और वे युद्ध न करते पर माता कुन्ती ने दुर्योधन जैसे अमानवीय और अधर्मी का विनाश करने के लिये ही पाण्डवों को युद्ध का आदेश दिया।
 जब जब धर्म को अनदेखा किया गया, और पाप को होने दिया गया, किसी न किसी रूप मे महाभारत होता आया है और होता रहेगा। आज इसी लिये गीता का अनुपालन हमारे जीवन मे और भी आवश्यक हो गया है। आज हमारा समाज व्यवस्थित रहे सुचारू रूप से चलता रहे इस हेतु धर्म का अनुपालन और आवश्यक हो गया है।

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