
आज के आतंकी आई्रएसआईएस, चंगेज खाॅ की तुलना मे कुछ भी नही हैं। बताते हैं कि वह जिधर से निकलता था उधर के दस दस हजार बच्चों के सिर कटवा देता था, सिर्फ सिर कटवाता नही था बल्कि आतंक फैलाने के लिये उसके सैनिक उन मासूम बच्चों के सिरों को अपने भालों पर लगा कर लहराते हुये चलते थे। गाॅव के गाॅव मे आग लगवाते चलता था कि रात मे उसके सैनिकों को प्रकाश की कमी न होने पाये। उसके आतंक से गर्भवती महिलाओं को पूर्व प्रसव हो जाया करते थे।
इतना खूॅखार और दुष्ट व्यक्ति भी निर्भय नही था। वह अपनी मौत से बहुत भयभीत था। बताते हैं कि डर के मारे वह रात मे सोता ही नही था, उसे डर लगा रहता था कि रात मे यदि , मेरे सैनिक किसी कारण सो गये तो कोई तंबू मे घुस कर उसकी हत्या कर सकता है। इस लिये वह रात के बजाय दिन मे सोता था, जब उसके विश्वासपात्र सैनिक बाहर पहरा दे रहे होते।
भय सबको होता है और सबके भय अलग अलग हैं। कुछ भय आप को कई जन्मों से घेरे हैं और कुछ भय हमे हमारे माॅ बाप , हमे बचपन मे अपने निजी स्वार्थों की खातिर , उपहार मे, जीवन भर के लिये दे देते हैं। हमारे विभाग मे रमेश पान्डे जी हैं, उम्र लगभग 51 साल है, आज भी अगर 500 मीटर की दूरी पर हाथी हो तो, कोई भले न देख पाये, रमेश जी देख लेते हैं, और बच्चों जैसे भय से काॅपने लगते हैं, जगह देख कर छुप जाते हैं। बचपन मे जब शैतानी करते थे तो माॅ बाप हाथी से डराते थे। आज वह भय अवचेतन तक जा पहॅचा है। कुछ भय हम खुद ही कमाते हैं, जैसे यदि हमने किसी चीज के लिये प्रयास किया और फेल हो गये या हमने किसी को फेल होते देखा तो हम भयभीत हो जाते है, और यदि कई बार फेल हो जाॅये तो डर हमारे अन्र्तमन पर हावी हो जाता है और हमे प्रयास ही नही करने देता। कुछ डर पिछले जन्मों के भी होते ह,ै जो हमारा अवचेतन आज भी ग्रहण किये हुये है। जैसे किसी के पिछले जीवन मे आगजनी हुई और उसकी जल कर मृत्यु हो गयी, तो कुछ लोगों का अवचेतन मन वह घबराहट और पीड़ा, आग देख कर इस जीवन मे भी महसूस करता है, जब कि वह व्यक्ति खुद नही समझ पाता कि ऐसा क्यों हो रहा है ?
हम भय को दूर करने के लिये जो प्रयास करते हैं, वह ऐसे ही है जैसे बिना जड़ को मिटाय,े सोचें कि पीपल के वृक्ष को हम नष्ट कर ले जायेंगे। जैसे चंगेज खाॅ को ही लीजिये, उसे अपनी मौत का डर जैसे जैसे और सताता गया तो उसने क्या किया ? बिना भय के मूल नष्ट किये उसने अपना पहरा और बढ़ा लिया और सोचता रहा कि मै अब भय मुक्त हॅू, , जब कि वह अंदर ही अंदर इतना आतंकित हुआ कि, नींद मे भी उसे सपना आने लगा कि कोई उसकी हत्या करने आ गया, और एक दिन जब वह गहरी नींद मे था तो उसने सपना देखा कि दुश्मन उसकी तम्बू मे घुस रहे हैं, वह अपने बिस्तर से झटके से उठा और अपने तम्बू से बाहर भागा पर उसका पैर एक रस्सी मे फॅस गया और वह घबराहट मे मर गया।
कोई भी भय हो यदि वह हमारे अवचेतन तक पहॅुच गया है तो, उससे आप बाहर से लड़ कर जीत नही सकते, उल्टे वह धीरे धीरे एक फोबिया बनता जायेगा। यदि आप के पास ऐसा कोई बच्चा या वयस्क हो तो कोई बाहरी उपाय करने के पहले, प्यार से उसके अन्र्तमन मे जा कर असल वजह ढॅूढने की कोशिश करें, और बार बार सकारात्मक सुझाव दे कर भय को दूर करने का प्रयास करें। अच्छा हो यदि आप किसी प्रोफशनल हिप्नोटिस्ट से सम्पर्क करें। इतने तरह के भय और उन्हे दूर करने के उपाय हैं कि एक ही ब्लाग मे सब को शामिल कर पाना सम्भव नही है।
एक विशेष बात कभी भी, बचपन मे किसी मासूम बच्चे को, चाहे जो कारण हो डराने का काम न करें। यदि कोई कर रहा हो तो उसे रोके। आज का बच्चा यदि डरा रहेगा, तो कल हम और हमारी सीमायें असुरक्षित हो जायेंगे।
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