Saturday, 31 October 2015

सन्तों की अजब कहानी -


सन्त कबीर के जीवन मे एक कथा है जो सामान्य जनमानस के जीवन परिधि से परे है। कबीर के यहाॅ रोज शाम को धर्म चर्चा होती, उस चर्चा मे कभी कभी देर भी हो जाता और कबीर अपने सन्त सुलभ स्वभाव वश , सब सन्त जनों को भोजन के लिये रोक लेते , यह उनके रोज के जीवन मे शामिल हो गया था।
कबीर जी खुद तो बाहर चर्चा मे रहते,  और वहीं से अपनी पत्नी लोई को आवाज लगा देते कि इतने सन्तों का भोजन बनना है। इसके बाद की जिम्मेदारी लोई की होती थी, कि वह भोजन का इन्तजाम करे , चाहे जैसे करे। इस सब मे कभी कभी लोई को अपने बच्चों को भूखा रखना पड़ता। वह दिन मे कबीर से रोज श्किायत करती कि ऐसे कैसे चलेगा ? आप रोज इतने लोगों को क्यो भोजन का न्योता दे देते हैं ? जब कि अपने खुद के बच्चे भूखे रह जाते हैं।
एक दिन धर्म चर्चा के बाद करीब दस सन्यासी बच गये। लोई ने किसी बहाने से कबीर को अन्दर बुलाया और बताया अब तो बनिये ने भी उधार देने से मना कर दिया है, आज किसी को भोजन के लिये मत कहना,  पर कबीर ने कहा कुछ भी करो , मेरे घर से सन्यासी कैसे भूखे जा सकते हैं ? कुछ गिरवी रख कर ले आओ, सन्तों को तो भूखा नही रख सकते।
लोई ने सन्तों को भोजन तो करा दिया पर जिस शर्त पर बनिये ने सामान दिया था, वह सामान्य जन मानस के सोच मे नही समा सकता। बनिये की शर्त थी कि तुम कबीर की पत्नी हो, तुम अपने वादे से नही मुकरोगी, इस लिये मै तुम्हे अन्न तो दे दॅूगा , पर अन्न के बदले एक वादा कर के जाओ कि, सन्तों को भोजन कराने के बाद रात के अॅधेरे मे मुझे खुश करने आ जाओगी। सन्तों के भोजन का सवाल था, वह खुद भी सन्त की पत्नी थी और कबीर ने कह रखा था कि कुछ भी गिरवी रख कर ले आओ। लोई के पास कुछ बचा तो था नही गिरवी रखने को, उसने अपने तन का सौदा कर लिया।
सन्तों के भोजन कर लेने के बाद लोई ने साफ साफ कबीर को बनिये के शर्त के बारे मे बता दिया, और कहानी कहती है कि कबीर स्वयं लोई को ले कर बनिये के पास गये कि, यह लो अपनी अमानत और अपनी शर्त पूरी कर लो। कहानी आगे कहती है कि बनिये को कबीर मे, जग और सन्तों के रखवाले श्रीराम के दर्शन हुये , वह कबीर के चरणों मे गिर गया कि एक आप हैं कि, धर्म और सन्तों के भोजन के लिये अपनी पत्नी को मेरे हवाले कर रहे हैं , एक मै पापी हॅू कि कुछ अन्न के बदले आप की पत्नी पर बुरी नजर डाला। जिस देश मे आप जैसे सन्त पैदा हों उस देश से धर्म का विनाश कोई नही कर पायेगा।
कबीर ने जात पाॅत , ऊॅच नीच कभी नही माना, और अपने ही प्रेम की मस्ती मे जीवन भर रहे।

Friday, 30 October 2015

GEETA PART 2 , गीता अंक 2,


 महाभारत या धर्म की अनदेखी  
स्वयं पाप न करना, परन्तु पाप कर्म होते हुये देखना या उसमे मूक सहमति देना, पाप करने से ज्यादा वीभ्त्सकारी है, इस बात का प्रमाण है महाभारत का युद्ध।
कुरूवंश मे धर्म का पालन होता था, इसी लिये युद्धभूमि जैसी जगह को भी धर्मभूमि की संज्ञा दी गयी थी, यानि युद्ध कर्म को भी धर्म समझा जाता था। धृतराष्ट्र ने पुत्र मोह मे उस समय मुॅह नही खोला या दुर्योधन को नही रोका जब  उसने भीम को जहर दे कर जल मे प्रवाहित कर दिया,  जब उसने, पाण्डवों को उस समय लाक्षगृह मे जलाने की कोशिश की, जब कि वे बेचारे शर्त को मानते हुये अज्ञात वास पर थे।  धृतराष्ट्र ने उस समय भी मुॅह नही खोला जब दुर्योधन ने जुये मे शकुनि के साथ मिल कर, दुर्योधन के साथ छल किया और भरी सभा मे द्रौपदी को नग्न करने की कोशिश की। यदि धृतराष्ट्र समय रहते धर्म के पक्ष मे मॅुह खोलते और अपने पुत्रों को रोकते तो भी शायद यह युद्ध न होता, पर अपने पुत्र को राजा बनाने की इच्छा उन्हे मौन धारण करने हेतु प्रेरित किया।
 इस बात का दुख माता कुन्ती को भी था कि वे सब आपस लड़ते मरते, कुछ भी करते पर बीच मे अपने अहंकार के कारण द्रौपदी को नंगा करने की कोशिश गलत था, इतना ही नही माता कुन्ती को इस बात का भी अत्यधिक क्लेश था कि जब भगवान कृष्ण संधि प्रस्ताव ले कर हस्तिनापुर गये तो दुर्योधन के मित्रों ने कृष्ण को बन्दी बनाने की कोशिश की।
  महाराज युधिष्ठर को धर्मराज कहा जाता था , उनकी इच्छा कदापि नही थी कि युद्ध हो और वे युद्ध न करते पर माता कुन्ती ने दुर्योधन जैसे अमानवीय और अधर्मी का विनाश करने के लिये ही पाण्डवों को युद्ध का आदेश दिया।
 जब जब धर्म को अनदेखा किया गया, और पाप को होने दिया गया, किसी न किसी रूप मे महाभारत होता आया है और होता रहेगा। आज इसी लिये गीता का अनुपालन हमारे जीवन मे और भी आवश्यक हो गया है। आज हमारा समाज व्यवस्थित रहे सुचारू रूप से चलता रहे इस हेतु धर्म का अनुपालन और आवश्यक हो गया है।

GEETA PART 2 , गीता अंक 2,

GEETA PART 2 , गीता अंक 2,

Thursday, 29 October 2015

गीता भाग 1 Gita Part 1


प्रथम अध्याय:
श्लोक 1: धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
  ममकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।
शब्दार्थ: धृतराष्ट्र संजय से कहते हैं-
हे संजय! धर्मभूमि कुरूक्षेत्र मे, युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुये मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
असल मे संजय गवल्गण नामक सूत के पुत्र थे, वे महान धर्मात्मा और ज्ञानी थे, इसी लिये वे  धृतराष्ट्र के मन्त्री थे। संजय के पास दिव्य दृष्टि थी पर ये उनकी अपनी ताकत नही थी यह तो उन्हे महर्षि वेदव्यास ने  धृतराष्ट्र , को युद्ध का आॅखो देखा हाल सुनाने के लिये दिया था, क्यों कि महर्षि वेदव्यास ने दुर्योधन के रवैये को पहचान लिया था, उसके अहंकार और अनैतिक व्यवहार से उन्हे लग गया था कि युद्ध तो अवश्यभंावी है।
 दुर्योधन को जब लोगों ने समझाने का प्रयास किया कि जो तुम कह रहे हो कि बिना युद्ध के मै सुई के नोक बराबर जमीन भी नही दॅूगा यह गलत है, अनैतिक है, धर्म विरूद्ध है तो उसने कहा कि मुझे धर्म और नैतिकता का पूरा ज्ञान है, मै भी कह रहा हॅू कि युद्ध गलत है, पर मै अपनी भुजाओं के ताकत का क्या करूॅ ? अपनी युद्ध की कला का क्या करूॅ ? अपनी इस विशाल सेना और अपने महान धुरंधर मित्रों का का क्या करूॅ ? जमीन जायदाद तो युद्ध का एक बहाना है, युद्ध तो हो कर रहेगा। इस तरह से महाभारत , द्रौपदी के कारण नही बल्कि दुर्योधन के अहंकार और अतिरिक्त बल के कारण हुआ।
जैसे हमारा कोई विकलांग बच्चा हो , तो बाकी बच्चों की तुलना मे हमारा विशेष स्नेह अपने विकलांग बच्चे पर होगा उसी तरह महर्षि वेदव्यास, धृतराष्ट्र के अंधेपन के कारण उन्हे बहुत ही स्नेह देते थे। उस स्नेहवश महर्षि वेदव्यास ने उनसे कहा , अब , जब कि क्षत्रियों का विनाश तय है, तो यदि तुम्हे युद्ध देखने की आकांक्षा हो तो मै तुम्हे दिव्य दृष्टि दे सकता हॅू कि तुम यहीं से बैठे बैठे जान सकते हो कि कुरूक्षेत्र मे क्या हो रहा है ? पर धृतराष्ट्र ने अपने कुल का संहार स्वयं की आॅखों से देखने से मना कर दिया। उनका कहना था कि जब मै जीवन भर अंधा था मैने कुछ भी अच्छा बुरा नही देखा तो अब वृद्धावस्था मे अपने ही वंशज का विनाश अपनी आॅखो से क्यों देखॅू ? इसके बजाय उन्होने यह इच्छा अवश्य जाहिर की कि, मै युद्ध का एक एक समाचार जरूर सुनना चाहॅूगा, और इसी कारण व्यास जी ने यह ताकत धृतराष्ट्र के मन्त्री संजय को दिया। वह दिव्य दृष्टि ऐसी थी कि संजय धृतराष्ट्र के बगल मे बैठे बैठे ही न सिर्फ युद्ध को देख सकता था, बल्कि सैनिकों या युद्ध भूमि मे मौजूद किसी के भी मनोभावों को पढ़ सकता था जान सकता था।
अब उसी कड़ी मे धृतराष्ट्र युद्ध समाचार जानने हेतु संजय से कहते हैं-
हे संजय! धर्मभूमि कुरूक्षेत्र मे, युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुये मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
शेष अगले अंक मे

गीता भाग 1 GEETA PART 1

गीता भाग 1 GEETA PART 1

Sunday, 25 October 2015

FAITH


एक बार भगवान कृष्ण भोजन के लिये बैठे, राधा जी उनके पास ही बैठी थीं और पंखा कर रही थी। अभी भगवान ने पहला निवाला उठाया ही था कि पता नही क्या सोच कर भोजन छोड़ कर एक दम से महल के बाहर भागे, पीछे पीछे राधा जी भी भागीं। राधा जी को बहुत अचम्भा हुआ कि ऐसा क्या हुआ कि स्वयं दीना नाथ को भोजन छोड़ कर भागना पड़ा ? अभी सब लोग सोच विचार कर ही रहे थे कि कि भगवान वापस आते हुये दिखायी दिये, और आते ही वापस भोजन के लिये बैठ गये। राधा जी के मुख पर प्रश्नवाचक भाव था। जब राधा जी को कुछ जवाब नही मिला तो भोजनोपरान्त उन्होने आखिर पूछ ही लिया ”नाथ आप का जाना और फिर रास्ते से ही वापस आना कुछ समझ नही आया।” भगवान मुस्कुराये और जबाब दिये कि ”मेरा एक परम भक्त था, लोग उसे पत्थर मार मार रहे थे, मै उसे बचाने के लिये भागा, पर मेरे पहुॅचने के पहले उसने स्वयं पत्थर हाथ मे ले लिया। जब वह स्वयं मुकाबले मे आ गया तो मेरी आवश्यकता ही समाप्त हो गयी और मै वापस आ गया।”
सही बात है, हमे लगता है कि हम सब कुछ करते हैं, और जब तक हम इस अहंकार मे रहते हैं, हमे सही मार्ग नही मिलता, हमे परमात्मा से सहयोग नही मिलता, हमे ज्ञान नही मिलता। जब आप अपना अहंकार , कि मै ही सब कुछ करता हॅू, भूल कर परमात्मा की शरण मे पूरी तरह आ जाते हैं तो फिर परमात्मा अपनी जिम्मेदारी समझ कर आप की रक्षा करता है, आप को मार्ग दिखाता है।
ज्ीवन मे जब भी आप को कुछ समझ न आये, आप को रास्ता न मिले तो आप परमात्मा पर छोड़ कर देखिये। परमात्मा स्वयं तो नही आता, पर आप को रास्ता दिखाने के लिये किसी न किसी रूप मे आता अवश्य है, आप चाहें समझ सकें या न समझ सकें। असल मे जिस क्षण हम अहंकार शून्य होते हैं, उसी समय से आप परमात्मा की शरण मे आ जाते हैं।

Saturday, 24 October 2015

Bad Rules


लोग क्या कहेंगे ? इस बात का डर, स्ंकोच आदि वह चीज होते हैं जो बच्चों कुंठित ही नही करते बल्कि उन का सब कुछ छीन सकते हैं
मैने देखा है लोग अपने बच्चों को ज्यादा सौम्य और सुशील बनाने के चक्कर मे संकोची बना देते है, उन्हे डरा कर उनकी लीडरशिप छीन लेते हैं जो कि उन्हे हर क्षण उनके विकास मे सहायता के साथ उनकी रक्षा करता।
राहुल एक बहुत ही प्यारा और बुद्धिमान बच्चा था। उसकी राइटिंग की सभी तारीफ करते थे, उसके मार्क सदैव 80 प्रतिशत से ऊपर होते थे, समय से स्कूल आना, समय से स्कूल जाना, सब को उचित सम्मान देना, उस बच्चे की जितनी तारीफ की जाये, कम थी। उसके गाल इतने चिकने और गोल मोल थे कि कोई भी उसे छू देता था। वह अपने परिवार और रिश्तेदारों मे सब को प्यारा था।
राहुल के अब हाई स्कूल के एक्जाम नजदीक आ गये थे, उसके पापा जो कि एक परचून की दुकान चलाते थे, थोड़े थोड़े चिन्तित हो रहे थे, क्यों कि उन्हे तो टाइम मिल नही पाता था, पत्नी उतनी पढ़ी नही थी कि राहुल को मैथ और्र इंिग्लश पढ़ा सके, और उनके पास ट्यूशन कराने का बजट नही था। राहुल भी कभी कभी तनाव मे हो जाता , क्यों कि कुछ प्रश्नो को हल करने के लिये कुछ न कुछ मदद की दरकार हो जाती और तब, जब उसे मदद नही मिल पाती तो वह चिंतित हो जाता। बेटी रिया राहुल से छोटी थी और सातवें मे पढ़ रही थी।
राहुल की पढ़ाई के लिये ऊपर का एक मात्र कमरा खाली कर दिया गया था, जहाॅ कभी कभी रिया भी पढ़ने आ जाया करती थी। मार्च मे एक्जाम थे और अभी फरवरी की शुरूआत थी, जाड़ा अभी चल ही रहा था इस लिये रजाई ओढ़ कर पढ़ने मे राहुल को बहुत मजा आ रहा था। कभी कभी पढ़ते पढ़ते नीद भी आ जाती, पर खुद से आॅख भी खुल जाती और वह फिर पढ़ाई शुरू कर देता।
उस दिन शनिवार था। पापा जल्दी दुकान बन्द कर के आ गये, और आज उनके चेहरे पर विजयी मुस्कान थी, क्यों कि उनके साथ राहुल के मैथ के टीचर विजय सर थे। आते ही उन्होने आवाज लगायी ”बेटा राहुल देखो मेरे साथ कौन आया है ?” पापा ने राहुल को बताया कि विजय सर आज यहीं रूक कर तुम्हे मैथ पढ़ायेंगे। पर जहाॅ राहुल को प्रसन्न होना चाहिये था वह अन्दर ही अन्दर घबरा गया क्यों कि ये वही राहुल सर है जिनको उसने क्लास मे ही लड़कियों के पीठ पर चिकोटी काटते कई बार देखा था, वे उसका भी गाल अक्सर चूम लिया करते, पर उनका चूमना उसे अच्छा नही लगता था।
आज राहुल अकेले, विजय सर के साथ ऊपर के कमरे मे नही जाना चाहता था, पर वह किससे कहे और क्या कहे ? उसे कुछ समझ नही आया तो वह रिया को भी अपने साथ ले गया। रिया खाना खाने के बाद ज्यादा देर तक नही पढ़ पाती थी , वह दस बजे ही सो गयी। रात मे करीब 4 बजे रिया को बिस्तर मे कुछ हलचल महसूस हुई, पर वह नीद मे पलट कर फिर सो गयी। लेकिन थोड़ी ही देर मे उसे फिर एहसास हुआ कि विजय सर राहुल के पीठ पर चढ़े हैं और उसका मॅुह दबा के रखे हैं। उसे जैसे ही राहुल की कराहट का आभास हुआ उसने रजाई हटा दी। उसके रजाई हटाते ही विजय सर अपने कपड़े समेटते हुये छत से खिड़की पर लटकते हुये भाग गये। राहुल अपना दर्द भूल कर रिया को समझाने मे लग गया कि वह किसी को कुछ न बताये। रिया फिर से सो गयी।
सुबह जब तीनो नीचे नही आये तो राहुल की माॅ ऊपर आयी, रिया को जगाया और उन दोनों के बारे मे पूछने लगी। पहले तो रिया को कुछ नही समझ आया कि क्या करे ? पर उसने इशारों मे जहाॅ तक हो सकता था माॅ को समझा दिया। माॅ तो बिल्कुल सन्न रह गयी और बदहवाशों की तरह राहुल को ढूॅढना शुरू कर दी, राहुल कमरे के कोने मे डरा हुआ चादर लपेटे छिपा हुआ था।
राहुल संकोच न किया होता, उसका लीडर अगर दबाया न गया होता तो शायद यह न होता।

बेकार नियम Bad Rules

बेकार नियम Bad Rules

Friday, 23 October 2015

अनजान लड़का Unknown Boy

innocent
यह कहानी उन लोगों के लिये एक सीख है जो अपने बच्चों को नौकरों के भरोसे पालते हैं।
मै उन दिनों अपने मुम्बई आफिस मे पोस्टेड था। मेरा आफिस वी0 टी0 रेलवे स्टेशन से पैदल दूरी पर था, वहाॅ से चर्च गेट स्टेशन भी पास मे ही था। मेरी पोस्टिंग चॅू कि अस्थायी थी इस लिये कुछ दिनों के लिये मै अपनी पत्नी एवं बच्चों को भी मुम्बई ले आया था कि इसी बहाने मुम्बई घूम लेते हैं। मेरा शनिवार और रबिवार छुट्टी का दिन होता था, और बच्चों के लिये फुल मस्ती का दिन। उस सय मेरा बेटा सात साल का और बेटी पाॅच साल की थी। मै जब आफिस से लौट कर आता तो मुझे सब लोग तैयार मिलते, चाय पीने के बाद डेली हम लोग घूमने जाते, रात का खाना बाहर खाते हुये देर रात तक वापस आते।
मैरीन ड्राइव और जुहू बीच हम सब की पसंदीदा जगह थी। जब और कहीं जाने को नही समझ आता तो हम सब इन्ही किसी जगह पर चले जाते, एक छोटा सा टेन्ट किराये पर ले लेते, अपने बैग जूता चप्पल वगैरह उसमे रख देते और भीगी रेत और समुद्री लहरों का घंटों तक मजा लेते, थक जाते तो थोड़ी देर अपने टेन्ट मे रेस्ट ले लेते। दिन ढलते ढलते वापसी की तैयारी कर लेते। वे दिन मेरे परिवार के लिये किसी जन्नत मे वास से कम नही थे। पर एक दिन एक ऐसी घटना घट गयी जो हम आज तक नही भूले हैं।
शनिवार का दिन था, हम उस दिन करीब तीन बजे समुद्र के किनारे पहॅुच गये थे। बच्चे बहुत बहुत उत्साहित थे, धूप भी थोड़ी कम थी। बच्चे अपने बाल ले कर खेलना शुरू कर दिये थे। बराबर बीच पर जाते जाते बच्चे अब अभ्यस्त हो गये थे, वे अन्य बच्चों से भी घुल मिल जाते, उसी बहाने उन बच्चों के माॅ बाप से कभी कभी हमारी भी दोस्ती हो जाती और बच्चों का हमे थोड़ा कम ध्यान रखना पड़ता। उस दिन, करीब आठ साल का एक मासूम और सुन्दर सा बच्चा कहीं से आया, बहुत देर तक पहले तो वह बाहर बाहर से बच्चों का खेल देखता रहा, फिर कुछ देर बाद हमने देखा कि वह भी खेल मे शामिल है। र्कइे बार हमने कोशिश की कि जानें कि उसके माॅ बाप कौन हैं, या वह किसके साथ है ? पर वे हमें कहीं नजर नही आये, हम भी अपने अपने काम मे लग गये। शाम होते होते भीड़ कम होने लगी, हम ने टेन्ट जमा किया और अपने सामान समेटने लगे, तब तक वह बच्चा दूसरी तरफ जाने लगा था। हमने ज्यादा ध्यान नही दिया, और अपने आवास पर आ गये।
दूसरे दिन यानि रबिवार के दिन, मै साप्ताहिक विशेषांक ले कर आया। तीसरे पेज पर जो फोटो और हेडिंग छपी थी उसे देख कर मै तो सन्न रह गया, उस बच्चे की तस्वीर के ऊपर लिखा था ”बच्चे की समुद्र मे डूबने से मौत, माॅ बाप का पता नही”। हम सब ने अपना घूमने का प्रोग्राम कैन्सेल कर दिया था। मै जुहू पुलिस स्टेशन गया, जो मुझे जानकारी थी मैने इन्सपेक्टर को बतायींे । करीब 11ः30 बजे एक बदहवाश से पति पत्नी आये, ये बच्चा उन्ही का था।
शाम को सांध्य कालीन अंक मे मैने जो कहानी पढ़ी वह इस प्रकार है- वे पति पत्नी एक मल्टी नेशनल कम्पनी मे बहुत ही अच्छे और जिम्मेदार पोस्ट पर थे। यह उनकी एक मात्र सन्तान थी। बच्चे के लिये मुम्बई मे बड़ा फ्लैट, बड़ी गाड़ी और विदेश मे पढ़ाई करानी थी, इस लिये माॅ ने अपनी नौकरी जारी रखी थी। बच्चे को पालने के लिये, और घर की देखभाल के लिये उन्होने एक आया कर रखी थी। उस दिन शनिवार था, बच्चा जल्दी घर आ गया था। आया, उसे नाश्ता करा कर के खुद सो गयी। बच्चा पता नही किस मूड मे था और घर से निकल लिया और यह हादसा हो गया।
हम पति पत्नी पूरी रात नही सो सके। उस बच्चे का और उन दम्पत्ति का चेहरा मेरी आॅखों पर छाया रहा। ऐसा पैसा किस काम का जो अपने खुद के बच्चे की परवरिश न कर सके।

Wednesday, 21 October 2015

बाबू मुझे घर ले चलोगे ?

बाबू मुझे घर ले चलोगे ?

Babu mujhe ghar le chaloge ?


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Tuesday, 20 October 2015

ज्यादा बनो मत !

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प्यार , प्रेम एक ऐसी चीज , जिसे पाने के लिये , महसूस करने के लिये मानव तो क्या , देवी देवता , पशु पक्षी तक बेचैन रहते हैं। प्यार की माॅग कभी कम नही होती, पर इसको बाॅटने वाला कभी घाटे मे नही रहता, जितना ही बाॅटता है, उसका कई गुना उसे वापस मिलने लगता है। प्यार देने और लेने की कोई शर्त नही होती, जिसके अन्दर प्यार उपजने लगता है , वह देते समय कुछ भी नही देखता कि, किसे प्यार बाॅट रहा हॅू , क्यों बाॅट रहा हॅू ? उस के पास इतना ज्यादा होता है कि, वह बिना बाॅटे रह ही नही सकता, उसके लिये हर कोई सुन्दर है, पूरी प्रकृति सुन्दर है।
प्यार पाने का सबसे आसान तरीका है, सहज हो जाना, बनावटी पन से दूर हो जाना, अपने मूल स्वरूप मे रहना, यानि एक दम मौलिक स्वरूप मे आ जाना। जब आप अपने को दिखाने की कोशिश छोड़ देते हैं तो, आप एक दम प्रकृति के करीब हो जाते हैं , तब जो आप का स्वाभाविक स्वभाव होता है, वह सभी के दिल को स्वाभाविक रूप से छू जाता है। जब आप जो नही हैं, वह दिखने की कोशिश करते हैं, तो आप के व्यवहार का परिवर्तन स्पष्ट नजर आने लगता है। छोटे बच्चे भी जब आपस मे झगड़ा करते हैं तो कहते हैं ”ज्यादा बनो मत।”
बच्चे जब तक अपने सहज स्वभाव मे होते हैं, वो सबको निश्छल भाव से प्रेम देते हैं और सब को प्यारे होते हैं, वो गलती भी करते हैं तो भी उन्हे प्यार मिलता है, वे आपका दाढ़ी मूॅछ नोच लेते हैं, पर तब भी आप उन्हे और कस के चूम लेते हैं। वही बच्चे जैसे जैसे , धीरे धीरे बढ़ते हैं थोड़ी दुनियादारी और चालबाजी सीखते हैं, आप का व्यवहार उनके प्रति बदलता जाता है।
मेरे मुहल्ले मे जूली आयी, कब वह पूरे मुहल्ले के दिल मे समा गयी, हम जान ही नही पाये। वह बस इतना करती है कि मुहल्ले का कोई भी, कहीं भी मिल जाये, वह बेलाग उसके पीछे पीछे दूर तक जायेगी, मौका मिले तो हाथ पैर चूमने के साथ, ऊपर तक चढ़ने की कोशिश करेगी। उसको आप कुछ भी न दो तो भी उसका व्यवहार वही रहता है। उसका यह निश्छल प्रेम लोगों को अनचाहे ही उसका दीवाना बना देता है। उसका बिस्कुट खाने का मन होता है तो वह शापिंग सेन्टर चली जायेगी, वहाॅ उसे कोई न कोई बिस्कुट का पूरा पूरा पैकेट खिलाता ही खिलाता है। अब तो आप समझ ही गये होंगे, जूली कौन है ? जी हाॅ जूली एक प्यारी सी देशी कुतिया है जो मेरे मुहल्ले की रानी है। उसके प्यार के कारण, पूरा मुहल्ला उसका रक्षक है। प्यार बाॅटना हम रोज उससे सीखते हैं।julie
काश हमारी जरूरतें ज्यादा न होतीं तो हम भी इतने चाल बाज नही होते, हमारा समाज हमे होशियारी नही सिखाता और हम असली जन्नत मे होते।

Thursday, 15 October 2015

where is love प्रेम है कहाॅ

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सारे धर्म कहते हैं प्रेम करो पर क्या आप को लगता है कि, किसी धर्म मे प्रेम बचा है ? धर्म की आड़ मे जितनी क्रूरता पूर्ण हत्यायें हुई हैं उतनी शायद और किसी कारणों से हुई हो। फिर कैसा प्रेम ? हम धर्म की बातें चाहे जितनी कर लें , पर असल मे हमारे अन्तस्तल मे तो बम है, जानवर है, जरा सी किसी ने हमारे धर्म के विरोध मे कहा कि हमारा विस्फोट हो जाता है। धर्म चाहे जो हो पर अगर वो हमारा अन्तस्तल परिवर्तित न कर सके, हमे सही मार्ग न दे सके तो वह दो कौड़ी का है, वह सिर्फ समय और धन का दुरूपयोग है। धर्म का सहारा मानव सभ्यता को विकसित करने के लिये होना चाहिये, न कि लड़ाने और तोड़ने के लिये। धर्म कोई भी बुरा नही है, बुराई है उसे अपने मतलब के लिये इस्तेमाल करना। दंगे और कुछ नही, अपने पीछे भीड़ जमा करने की ख्वाहिश मे, धार्मिक नेता बनने की ख्वाहिश मे लोगों को उकसा कर समाज को गुमराह कर देना है।
बस्ती मे मेरा एक दोस्त था रजी। हम छोटे थे तो हर त्योहारों मे एक दूसरे के यहाॅ आते जाते थे, कभी कभी घरवालों के विरोध के बावजूद। जब बड़े हुए तो हमने इतनी विवकेशीलता दिखायी, हम किसी भी धार्मिक परिचर्चा से समय रहते उठ जाते। लगभग हर साल मूर्तिविसर्जन को ले कर बवाल होता था, हम तब भी रात मे साथ घूम रहे होते थे, हमारे अन्दर इतनी आपसी समझ थी कि हमारी दोस्ती पहले है, ये कथित धर्म बाद मे, चाहे जो हो हम आपस मे नही लड़ने वाले।
मेरी बात आप को बुरी लग सकती है पर मै फिर भी कहॅूगा “ धर्म समाज के द्वारा, बचपन मे ही मासूम बच्चों को दिया जाने वाला धीमा जहर है, उनके विकास को रोकने का, उनकी आजादी छीनने का एक जरिया है। धर्म के नाम पर उन्हे डराया गया है, आस्था के नाम पर उनकी खोज करने की क्षमता को बाधित किया गया है। विज्ञान के तरफ जाने से रोका गया है। आज धर्म के नाम पर सिर्फ शोर मचाना रह गया है हम स्वयं, धर्म के बारे मे कुछ खोज नही करते, जानना नही चाहते और उसी मे अपनी नयी पीढ़ी को भी ढकेल दे रहे हैं। मेरे अनुसार धर्म की शिक्षा बच्चे को तब दिया जाना चाहिये जब वह समझने लायक हो जाये, वह खुद घोषणा करने लायक हो जाये कि उसे कोई धर्म चुनना है या नही, और यदि चुनना है तो कौन सा ? यह उसकी निजी राय हो आप द्वारा थोपी गयी नही।“

Saturday, 10 October 2015

भय से दो दो हाथ

fearful face
आज के आतंकी आई्रएसआईएस, चंगेज खाॅ की तुलना मे कुछ भी नही हैं। बताते हैं कि वह जिधर से निकलता था उधर के दस दस हजार बच्चों के सिर कटवा देता था, सिर्फ सिर कटवाता नही था बल्कि आतंक फैलाने के लिये उसके सैनिक उन मासूम बच्चों के सिरों को अपने भालों पर लगा कर लहराते हुये चलते थे। गाॅव के गाॅव मे आग लगवाते चलता था कि रात मे उसके सैनिकों को प्रकाश की कमी न होने पाये। उसके आतंक से गर्भवती महिलाओं को पूर्व प्रसव हो जाया करते थे।
इतना खूॅखार और दुष्ट व्यक्ति भी निर्भय नही था। वह अपनी मौत से बहुत भयभीत था। बताते हैं कि डर के मारे वह रात मे सोता ही नही था, उसे डर लगा रहता था कि रात मे यदि , मेरे सैनिक किसी कारण सो गये तो कोई तंबू मे घुस कर उसकी हत्या कर सकता है। इस लिये वह रात के बजाय दिन मे सोता था, जब उसके विश्वासपात्र सैनिक बाहर पहरा दे रहे होते।
भय सबको होता है और सबके भय अलग अलग हैं। कुछ भय आप को कई जन्मों से घेरे हैं और कुछ भय हमे हमारे माॅ बाप , हमे बचपन मे अपने निजी स्वार्थों की खातिर , उपहार मे, जीवन भर के लिये दे देते हैं। हमारे विभाग मे रमेश पान्डे जी हैं, उम्र लगभग 51 साल है, आज भी अगर 500 मीटर की दूरी पर हाथी हो तो, कोई भले न देख पाये, रमेश जी देख लेते हैं, और बच्चों जैसे भय से काॅपने लगते हैं, जगह देख कर छुप जाते हैं। बचपन मे जब शैतानी करते थे तो माॅ बाप हाथी से डराते थे। आज वह भय अवचेतन तक जा पहॅचा है। कुछ भय हम खुद ही कमाते हैं, जैसे यदि हमने किसी चीज के लिये प्रयास किया और फेल हो गये या हमने किसी को फेल होते देखा तो हम भयभीत हो जाते है, और यदि कई बार फेल हो जाॅये तो डर हमारे अन्र्तमन पर हावी हो जाता है और हमे प्रयास ही नही करने देता। कुछ डर पिछले जन्मों के भी होते ह,ै जो हमारा अवचेतन आज भी ग्रहण किये हुये है। जैसे किसी के पिछले जीवन मे आगजनी हुई और उसकी जल कर मृत्यु हो गयी, तो कुछ लोगों का अवचेतन मन वह घबराहट और पीड़ा, आग देख कर इस जीवन मे भी महसूस करता है, जब कि वह व्यक्ति खुद नही समझ पाता कि ऐसा क्यों हो रहा है ?
हम भय को दूर करने के लिये जो प्रयास करते हैं, वह ऐसे ही है जैसे बिना जड़ को मिटाय,े सोचें कि पीपल के वृक्ष को हम नष्ट कर ले जायेंगे। जैसे चंगेज खाॅ को ही लीजिये, उसे अपनी मौत का डर जैसे जैसे और सताता गया तो उसने क्या किया ? बिना भय के मूल नष्ट किये उसने अपना पहरा और बढ़ा लिया और सोचता रहा कि मै अब भय मुक्त हॅू, , जब कि वह अंदर ही अंदर इतना आतंकित हुआ कि, नींद मे भी उसे सपना आने लगा कि कोई उसकी हत्या करने आ गया, और एक दिन जब वह गहरी नींद मे था तो उसने सपना देखा कि दुश्मन उसकी तम्बू मे घुस रहे हैं, वह अपने बिस्तर से झटके से उठा और अपने तम्बू से बाहर भागा पर उसका पैर एक रस्सी मे फॅस गया और वह घबराहट मे मर गया।
कोई भी भय हो यदि वह हमारे अवचेतन तक पहॅुच गया है तो, उससे आप बाहर से लड़ कर जीत नही सकते, उल्टे वह धीरे धीरे एक फोबिया बनता जायेगा। यदि आप के पास ऐसा कोई बच्चा या वयस्क हो तो कोई बाहरी उपाय करने के पहले, प्यार से उसके अन्र्तमन मे जा कर असल वजह ढॅूढने की कोशिश करें, और बार बार सकारात्मक सुझाव दे कर भय को दूर करने का प्रयास करें। अच्छा हो यदि आप किसी प्रोफशनल हिप्नोटिस्ट से सम्पर्क करें। इतने तरह के भय और उन्हे दूर करने के उपाय हैं कि एक ही ब्लाग मे सब को शामिल कर पाना सम्भव नही है।
एक विशेष बात कभी भी, बचपन मे किसी मासूम बच्चे को, चाहे जो कारण हो डराने का काम न करें। यदि कोई कर रहा हो तो उसे रोके। आज का बच्चा यदि डरा रहेगा, तो कल हम और हमारी सीमायें असुरक्षित हो जायेंगे।

Monday, 5 October 2015

समाज की चिन्ता न करें


चिंतित हम सब होते हैं, कभी अपने भविष्य कोे ले कर, कभी अपने बच्चों के भविष्य को ले कर, कभी आपसी विवाद को ले कर। कभी कभी तो लोगों की चिन्तायें इतनी बढ़ जाती हैं कि नर्वस ब्रेकडाउन तक हो जाता है। परन्तु यदि हम गहरे मे सोचें तो हमारी अधिकतर चिन्तायें सिर्फ इस लिये होती हैं कि समाज क्या कहेगा ? पर जो समाज की चिन्ता किये बगैर काम करता है, जिसे अपने पर भरोसा होता है, उन्मुक्त भाव से काम करता है वही समाज को कुछ दे भी पाता है, वही एक मिसाल कायम कर पाता है, वही चिन्ता मुक्त और स्वस्थ भी रह पाता है। समाज का क्या है उसे तो कुछ न कुछ कहना ही है।
मैने सुना है कि एक पिता अपने बेटे और गघे को ले कर कहीं जा रहा था। उसने सोचा कि यदि हम दोनो गघे पर चढ़ जाते हैं तो लोग यही कहेंगे कि कि दोनो गधे पर चढ़ कर बेचारे गधे को मारे डाल रहे हैं इस लिये वह गधे और बेटे के साथ पैदल ही चल पड़ा। अभी वह थोड़ी ही दूर गया था कि रास्ते मे कुछ लोग मिले और कहने लगे “देखो ये कितने मूर्ख हैं गधा साथ है फिर भी पैदल चल रहे हैं।“ पिता ने सोचा कि अब क्या करूॅ, ऐसा करता हॅू कि बेटे को गधे पर बैठा देता हॅू नही तो लोग कहेंगे कि खुद गधे पर बैठा है और बेटा पैदल चल रहा है। अभी वह थोड़ी ही दूर जा पाया था कि रास्ते मे कुछ लोग और मिले और कहने लगे “देखो क्या जमाना आ गया है ? बच्चों ने तो माॅ बाप की कद्र करना ही छोड़ दिया है बेटा खुद गधे पर चढ़ा है और बाप पैदल चल रहा है।” पिता ने सोचा कि अब क्या करूॅ, ऐसा करता हॅू कि बेटे को गधे से उतार देता हॅू और खुद बैठ जाता हॅू। अभी वह थोड़ी ही दूर और जा पाया था कि रास्ते मे कुछ लोग फिर मिल गये और कहने लगे “देखो क्या जमाना आ गया है बाप को तो सिर्फ अपनी फिकर है, खुद गधे पर बैठा है, मासूम बेटा पैदल चल रहा है ? अब वह गुस्से के मारे खुद भी बैठ गया और बेटे को भी बैठा रहने दिया। पर लोग कहाॅ मानने वाले, बेचारा जैसे ही थोड़ा आगे गया पीछे से चिल्लाने लगे ” तुम सब कितने मूर्ख हो निर्दयी हो बेचारे गधे की जान ले लोगे क्या ?“
उसने गुस्से और अवसाद मे गधे को पुल से नीचे धक्का दे दिया और घर वापस आ गया। लोग तब भी कहाॅ पीछा छोड़ने वाले, पूरा गाॅव इकट्ठा हो गया और सब उसे बुद्धू कहने लगे। पीछे से कोई चिल्लाया “लौट के बुद्धू घर को आये।”
तो जो समाज की ज्यादा चिन्ता करता ह्रै लोग उसे बुद्धू ही करार देते हैं, इस लिये यदि आप को लगता है कि आप सही कर रहे हैं, कोई अनैतिक काम नही कर रहे हैं तो समाज की चिन्ता किये बगैर अपने मिशन पर कायम रहें। चिन्ता मुक्त रह कर स्वस्थ जीवन जीयें।