सन्त कबीर के जीवन मे एक कथा है जो सामान्य जनमानस के जीवन परिधि से परे है। कबीर के यहाॅ रोज शाम को धर्म चर्चा होती, उस चर्चा मे कभी कभी देर भी हो जाता और कबीर अपने सन्त सुलभ स्वभाव वश , सब सन्त जनों को भोजन के लिये रोक लेते , यह उनके रोज के जीवन मे शामिल हो गया था।
कबीर जी खुद तो बाहर चर्चा मे रहते, और वहीं से अपनी पत्नी लोई को आवाज लगा देते कि इतने सन्तों का भोजन बनना है। इसके बाद की जिम्मेदारी लोई की होती थी, कि वह भोजन का इन्तजाम करे , चाहे जैसे करे। इस सब मे कभी कभी लोई को अपने बच्चों को भूखा रखना पड़ता। वह दिन मे कबीर से रोज श्किायत करती कि ऐसे कैसे चलेगा ? आप रोज इतने लोगों को क्यो भोजन का न्योता दे देते हैं ? जब कि अपने खुद के बच्चे भूखे रह जाते हैं।
एक दिन धर्म चर्चा के बाद करीब दस सन्यासी बच गये। लोई ने किसी बहाने से कबीर को अन्दर बुलाया और बताया अब तो बनिये ने भी उधार देने से मना कर दिया है, आज किसी को भोजन के लिये मत कहना, पर कबीर ने कहा कुछ भी करो , मेरे घर से सन्यासी कैसे भूखे जा सकते हैं ? कुछ गिरवी रख कर ले आओ, सन्तों को तो भूखा नही रख सकते।
लोई ने सन्तों को भोजन तो करा दिया पर जिस शर्त पर बनिये ने सामान दिया था, वह सामान्य जन मानस के सोच मे नही समा सकता। बनिये की शर्त थी कि तुम कबीर की पत्नी हो, तुम अपने वादे से नही मुकरोगी, इस लिये मै तुम्हे अन्न तो दे दॅूगा , पर अन्न के बदले एक वादा कर के जाओ कि, सन्तों को भोजन कराने के बाद रात के अॅधेरे मे मुझे खुश करने आ जाओगी। सन्तों के भोजन का सवाल था, वह खुद भी सन्त की पत्नी थी और कबीर ने कह रखा था कि कुछ भी गिरवी रख कर ले आओ। लोई के पास कुछ बचा तो था नही गिरवी रखने को, उसने अपने तन का सौदा कर लिया।
सन्तों के भोजन कर लेने के बाद लोई ने साफ साफ कबीर को बनिये के शर्त के बारे मे बता दिया, और कहानी कहती है कि कबीर स्वयं लोई को ले कर बनिये के पास गये कि, यह लो अपनी अमानत और अपनी शर्त पूरी कर लो। कहानी आगे कहती है कि बनिये को कबीर मे, जग और सन्तों के रखवाले श्रीराम के दर्शन हुये , वह कबीर के चरणों मे गिर गया कि एक आप हैं कि, धर्म और सन्तों के भोजन के लिये अपनी पत्नी को मेरे हवाले कर रहे हैं , एक मै पापी हॅू कि कुछ अन्न के बदले आप की पत्नी पर बुरी नजर डाला। जिस देश मे आप जैसे सन्त पैदा हों उस देश से धर्म का विनाश कोई नही कर पायेगा।
कबीर ने जात पाॅत , ऊॅच नीच कभी नही माना, और अपने ही प्रेम की मस्ती मे जीवन भर रहे।

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