Friday, 23 October 2015

अनजान लड़का Unknown Boy

innocent
यह कहानी उन लोगों के लिये एक सीख है जो अपने बच्चों को नौकरों के भरोसे पालते हैं।
मै उन दिनों अपने मुम्बई आफिस मे पोस्टेड था। मेरा आफिस वी0 टी0 रेलवे स्टेशन से पैदल दूरी पर था, वहाॅ से चर्च गेट स्टेशन भी पास मे ही था। मेरी पोस्टिंग चॅू कि अस्थायी थी इस लिये कुछ दिनों के लिये मै अपनी पत्नी एवं बच्चों को भी मुम्बई ले आया था कि इसी बहाने मुम्बई घूम लेते हैं। मेरा शनिवार और रबिवार छुट्टी का दिन होता था, और बच्चों के लिये फुल मस्ती का दिन। उस सय मेरा बेटा सात साल का और बेटी पाॅच साल की थी। मै जब आफिस से लौट कर आता तो मुझे सब लोग तैयार मिलते, चाय पीने के बाद डेली हम लोग घूमने जाते, रात का खाना बाहर खाते हुये देर रात तक वापस आते।
मैरीन ड्राइव और जुहू बीच हम सब की पसंदीदा जगह थी। जब और कहीं जाने को नही समझ आता तो हम सब इन्ही किसी जगह पर चले जाते, एक छोटा सा टेन्ट किराये पर ले लेते, अपने बैग जूता चप्पल वगैरह उसमे रख देते और भीगी रेत और समुद्री लहरों का घंटों तक मजा लेते, थक जाते तो थोड़ी देर अपने टेन्ट मे रेस्ट ले लेते। दिन ढलते ढलते वापसी की तैयारी कर लेते। वे दिन मेरे परिवार के लिये किसी जन्नत मे वास से कम नही थे। पर एक दिन एक ऐसी घटना घट गयी जो हम आज तक नही भूले हैं।
शनिवार का दिन था, हम उस दिन करीब तीन बजे समुद्र के किनारे पहॅुच गये थे। बच्चे बहुत बहुत उत्साहित थे, धूप भी थोड़ी कम थी। बच्चे अपने बाल ले कर खेलना शुरू कर दिये थे। बराबर बीच पर जाते जाते बच्चे अब अभ्यस्त हो गये थे, वे अन्य बच्चों से भी घुल मिल जाते, उसी बहाने उन बच्चों के माॅ बाप से कभी कभी हमारी भी दोस्ती हो जाती और बच्चों का हमे थोड़ा कम ध्यान रखना पड़ता। उस दिन, करीब आठ साल का एक मासूम और सुन्दर सा बच्चा कहीं से आया, बहुत देर तक पहले तो वह बाहर बाहर से बच्चों का खेल देखता रहा, फिर कुछ देर बाद हमने देखा कि वह भी खेल मे शामिल है। र्कइे बार हमने कोशिश की कि जानें कि उसके माॅ बाप कौन हैं, या वह किसके साथ है ? पर वे हमें कहीं नजर नही आये, हम भी अपने अपने काम मे लग गये। शाम होते होते भीड़ कम होने लगी, हम ने टेन्ट जमा किया और अपने सामान समेटने लगे, तब तक वह बच्चा दूसरी तरफ जाने लगा था। हमने ज्यादा ध्यान नही दिया, और अपने आवास पर आ गये।
दूसरे दिन यानि रबिवार के दिन, मै साप्ताहिक विशेषांक ले कर आया। तीसरे पेज पर जो फोटो और हेडिंग छपी थी उसे देख कर मै तो सन्न रह गया, उस बच्चे की तस्वीर के ऊपर लिखा था ”बच्चे की समुद्र मे डूबने से मौत, माॅ बाप का पता नही”। हम सब ने अपना घूमने का प्रोग्राम कैन्सेल कर दिया था। मै जुहू पुलिस स्टेशन गया, जो मुझे जानकारी थी मैने इन्सपेक्टर को बतायींे । करीब 11ः30 बजे एक बदहवाश से पति पत्नी आये, ये बच्चा उन्ही का था।
शाम को सांध्य कालीन अंक मे मैने जो कहानी पढ़ी वह इस प्रकार है- वे पति पत्नी एक मल्टी नेशनल कम्पनी मे बहुत ही अच्छे और जिम्मेदार पोस्ट पर थे। यह उनकी एक मात्र सन्तान थी। बच्चे के लिये मुम्बई मे बड़ा फ्लैट, बड़ी गाड़ी और विदेश मे पढ़ाई करानी थी, इस लिये माॅ ने अपनी नौकरी जारी रखी थी। बच्चे को पालने के लिये, और घर की देखभाल के लिये उन्होने एक आया कर रखी थी। उस दिन शनिवार था, बच्चा जल्दी घर आ गया था। आया, उसे नाश्ता करा कर के खुद सो गयी। बच्चा पता नही किस मूड मे था और घर से निकल लिया और यह हादसा हो गया।
हम पति पत्नी पूरी रात नही सो सके। उस बच्चे का और उन दम्पत्ति का चेहरा मेरी आॅखों पर छाया रहा। ऐसा पैसा किस काम का जो अपने खुद के बच्चे की परवरिश न कर सके।

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