Saturday, 21 November 2015
BE FEERLESS: Grow Your Powers ताकतों का विस्तार
BE FEERLESS: Grow Your Powers ताकतों का विस्तार: NASAL POWER , EYE POWER , MENTAL POWER , GROW YOUR MENTAL POWER मै एक दिन मनकापुर जा रहा था , मै कई सालों से उसी रोड से जा रहा हूँ , उसी ...
How to grow mental powers , कैसे करें अपनी ताकतों का विस्तार ?
MENTAL POWER , GROW YOUR MENTAL POWER
मै एक दिन मनकापुर जा रहा था , मै कई सालों से उसी रोड से जा रहा हूँ , उसी दुकान के बगल से जाता हूँ , वह दुकान बंद ही रहती है। उस दिन भी वह दुकान बंद थी , पर उस दुकान को देख कर जाने क्यों उस दिन अचानक से तिवारी की याद आ जाती है। तिवारी से मेरा कभी कुछ लेना देना नहीं था , हाँ मेरे एक मित्र ने उस से फर्नीचर बनवा कर ट्रक से मुंबई भेजा था , उन्ही के साथ मै तिवारी के दुकान पर एक दो बार गया था , पर पिछले कई सालों से वह दुकान बंद कर के कहीं बाहर चला गया था।
दो दिन बाद जब मै उधर से निकल रहा था तो अचानक मुझे तिवारी दिख गया। गाड़ी पर बैठे बैठे मैं सोचने लगा , अभी तक मुझे तिवारी की याद क्यों नहीं आई थी ? ये कैसा कनेक्शन है ?
ऐसा ही होता है , कई बार ऐसा होता है , आप के जीवन में भी इस तरह की घटनाएँ जरूर हुई होंगी। मै इन चीजों पर ज्यादा ध्यान देता हूँ इस लिए कुछ उदहारण देता हूँ - जब मै बाहर होता हूँ तो , कई बार एक ही समय पर , मै पत्नी को , और मेरी पत्नी मुझ को फ़ोन कर रही होती है , घर पहुँचने वाला होता हूँ तभी अचानक से खाने के बारे में सोचता हूँ , और घर पर वही बना होता है जो थोड़ी देर पहले मै सोच रहा था। जिस दिन मै सोचूँगा , कि मै कितने दिनों से बीमार नहीं हुआ ? शाम तक बीमार हो जाता हूँ। कहते हैं जब आप किसी के ज्यादा नजदीक हो जाओ तो कुछ दिन बाद दोनों की सोच , पहनावा , चाल चलन एक जैसी हो जाती है।
यह कुछ नहीं , कुछ ताकतें हैं जो परमात्मा ने हम सब को बिना भेद भाव के दिए हैं। कुछ लोगों ने इन ताकतों पर ध्यान दिया , और उनका संवर्धन किया। आप ही नहीं सृष्टि के हर जीव की अपनी विशेषता है , सब के पास कुछ न कुछ अलग तरह की ताकत है। आप की इन्द्रियाँ , आप का मस्तिष्क एक ताकत है।
आप कभी फुर्सत में हों तो आँख बंद कर लीजिये और प्रकृति के स्वाभाव को पहचनिये। एक चीज हर समय और लगातार हो रहा है , वह है सृजन , यानि ताकतों का विस्तार। पेड़ पौधे , पशु पक्षी सब किसी न किसी तरह अपनी ताकतों का विस्तार ही कर रहे हैं , पुनरुत्पादन भी अपनी ताकतों का विस्तार है। जो जैसे कर सकता है कर रहा है। जब आप दूरवीन बनाते हैं ,टीवी बनाते हैं तो वह आपकी आँखों का विस्तार है , इसी तरह मोबाइल , रेडियो , स्टेथोस्कोप कानो के विस्तार हैं , मोटर साइकिल , कार , हवाई जहाज पैरों के विस्तार हैं। आपकी नाक भी एक ताकत है , आप बिना देखे , बिना छुए जान सकते हैं किधर कौन सी चीजें रखी हैं ? आप अगर इसकी ताकत का विस्तार कर लें तो बहुत दूर तक के चीजों के बारे में आप कहीं से भी जान सकते हैं।
इसी तरह जब हम अपने मन की ताकतों का विस्तार कर लेते हैं तो , बहुत से आश्चर्य जनक काम करने लग जाते हैं।
कैसे करें अपनी ताकतों का विस्तार ? मन की ताकतों का विस्तार हो सके इस के लिए जरूरी है कि आपका मन शांत हो , आप अंतर्मुखी हों। प्रति दिन कम से कम एक घंटा अपनी शांति के लिए निकालें। आँख बंद कर लें और अंतरशून्य हो जाने दें , कुछ दिन के अभ्यास के बाद आपको स्वयं में परिवर्तन महसूस होने लगेगा। नाक की शक्तियों का विस्तार करने के लिए कुछ विशेष गंध को पहले नजदीक से सूंघ कर जान लेँ और फिर दूरी बढ़ा बढ़ा कर उसे सूंघ कर खोजने का प्रयत्न करें।
Wednesday, 18 November 2015
BE FEERLESS: FAITH
BE FEERLESS: FAITH: एक बार भगवान कृष्ण भोजन के लिये बैठे, राधा जी उनके पास ही बैठी थीं और पंखा कर रही थी। अभी भगवान ने पहला निवाला उठाया ही था कि पता नही क्...
Monday, 16 November 2015
OUR WORLD हमारी दुनिया
OUR WORLD , GOD AND CREATIVITY , WORSHIP AND GOD , GOD AND FRAUD
उसका , एक काल्पनिक रतन का पूरा बदन टूट रहा था , उसके , शरीर की एक एक माँस पेशियाँ दर्द से कराह रही थी। उसे उसकी पत्नी ने घर से निकाल दिया था , लोगों ने बहुत मारा था , पुलिस ने उसे मार कर लॉक अप में बंद कर दिया था। वह बेहोश हो गया था। जब उसकी चेतना धीरे धीरे वापस आई तो उसे क्रमशः एक एक चीज याद आने लगा और वह सोचने पर मजबूर हो गया -
कैसे हैं लोग , लोगों की मित्रता और उनकी दुनिया ? कैसे हैं ये रिश्तों के बाज़ार ? जो सिर्फ एक शब्द पर बिखर जाते हैं। सब ने क्या नकली प्यार और जज्बात का चादर ओढ़ रखा है ? क्या सब अंदर से हिंसक हैं ?
जो अप्रत्यक्ष है , अन्जान है , जिसके बारे में बहुत सी शंकाएँ हैं , जो सत्य है या भ्रम है उसके लिए अपने ही लोगों ने उसे बहुत मारा , जलाने की कोशिश की। उस अप्रत्यक्ष के लिए एक प्रत्यक्ष जीते जागते भावपूर्ण इन्सान के साथ इतना बुरा व्यव्हार ?
रतन ने जीवन भर कानपुर की एक फैक्ट्री में काम किया था , उसने काम को अपना भगवन मान लिया था। उसे भगवान , देवी देवता , मूर्ति फोटो , हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई और न जाने कितने ३६५ धर्म समझ नहीं आते थे। शिफ्ट , ओवर टाइम और समय से ड्यूटी आना जाना यही उसकी दुनिया थी।
परमात्मा , सृष्टि कर्ता , अल्लाह , जीसस सब के बारे में उसकी एक ही राय थी कि जिसे आप कल्पना कर सकें , जिसका आप निर्माण कर सकें , वह परमात्मा हो ही नहीं सकता , वह किसी लिमिट या दायरे में आ ही नहीं सकता , आप जहाँ भी हैं , जिसमे भी है सब परमात्मा है। इसके अलावा उसे किसी परमात्मा या धर्म कर्म से कोई मतलब नहीं था। वह अपनी कमाई अपनी पत्नी को सौंप देता था , वही घर चलाती थी।
कभी कभी इस बात पर रतन की अपनी पत्नी से झड़प भी हो जाती , वह कहता ,जब परमात्मा तुम से छुप रहा है तो क्यों उसे ढूढ़ रही हो ? अगर उसे मानव के साथ मिलना होता तो वह खुद ही मिल लेता। प्रकृति जो चाहती है वही होने देती है , उसे जो मानव को दिखानी थी वही दिखाई है जो नहीं दिखानी थी वह नहीं दिखाई है। जैसे हवा है बहुत सारी गैसें हैं अगर दिखने वाली चीजें होतीं तो दुनिया कैसी होती ? आप की भावनायें , आपकी आवाज, गंध अगर दिखने वाली चीजें होतीं तो दुनिया कैसी होती ? दुनिया संतुलित रहे इस बात का उसने पूरा ध्यान रखा है।
रतन का यह भी कहना था कि परमात्मा के नाम पर लोगों को धार्मिक जहर देना गलत है। अगर वह आपसे नहीं मिलना चाहता तो नहीं मिलेगा , आप चाहे जितना प्रयास कर लें।
रतन अब रिटायर हो चुका था। उसकी पत्नी अभी किसी माताजी की शिष्य बनी थी , जिनका कहना था कि वह वह साक्षात् देवी हैं , वह सारे दुखों का हरण कर के मोक्ष प्रदान करती हैं। लोग आंधी तूफान की तरह उस देवी के भक्त बन रहे थे। जब लोग माताजी के चरण स्पर्श कर रहे थे और उनके पूजन की तैयारी चल रही थी तभी वह स्टेज पर चढ़ गया था और माइक पर बोला , मोक्ष इनकी पॉकेट में नहीं रखा है ,जो आपको बाँट देंगी। आपको मोक्ष नहीं , आपके सब काम करने वाला एक नौकर चाहिए।
इतना बोलना ही उसकी दुर्गति का कारण बन गया था।
उसका , एक काल्पनिक रतन का पूरा बदन टूट रहा था , उसके , शरीर की एक एक माँस पेशियाँ दर्द से कराह रही थी। उसे उसकी पत्नी ने घर से निकाल दिया था , लोगों ने बहुत मारा था , पुलिस ने उसे मार कर लॉक अप में बंद कर दिया था। वह बेहोश हो गया था। जब उसकी चेतना धीरे धीरे वापस आई तो उसे क्रमशः एक एक चीज याद आने लगा और वह सोचने पर मजबूर हो गया -
कैसे हैं लोग , लोगों की मित्रता और उनकी दुनिया ? कैसे हैं ये रिश्तों के बाज़ार ? जो सिर्फ एक शब्द पर बिखर जाते हैं। सब ने क्या नकली प्यार और जज्बात का चादर ओढ़ रखा है ? क्या सब अंदर से हिंसक हैं ?
जो अप्रत्यक्ष है , अन्जान है , जिसके बारे में बहुत सी शंकाएँ हैं , जो सत्य है या भ्रम है उसके लिए अपने ही लोगों ने उसे बहुत मारा , जलाने की कोशिश की। उस अप्रत्यक्ष के लिए एक प्रत्यक्ष जीते जागते भावपूर्ण इन्सान के साथ इतना बुरा व्यव्हार ?
रतन ने जीवन भर कानपुर की एक फैक्ट्री में काम किया था , उसने काम को अपना भगवन मान लिया था। उसे भगवान , देवी देवता , मूर्ति फोटो , हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई और न जाने कितने ३६५ धर्म समझ नहीं आते थे। शिफ्ट , ओवर टाइम और समय से ड्यूटी आना जाना यही उसकी दुनिया थी।
परमात्मा , सृष्टि कर्ता , अल्लाह , जीसस सब के बारे में उसकी एक ही राय थी कि जिसे आप कल्पना कर सकें , जिसका आप निर्माण कर सकें , वह परमात्मा हो ही नहीं सकता , वह किसी लिमिट या दायरे में आ ही नहीं सकता , आप जहाँ भी हैं , जिसमे भी है सब परमात्मा है। इसके अलावा उसे किसी परमात्मा या धर्म कर्म से कोई मतलब नहीं था। वह अपनी कमाई अपनी पत्नी को सौंप देता था , वही घर चलाती थी।
कभी कभी इस बात पर रतन की अपनी पत्नी से झड़प भी हो जाती , वह कहता ,जब परमात्मा तुम से छुप रहा है तो क्यों उसे ढूढ़ रही हो ? अगर उसे मानव के साथ मिलना होता तो वह खुद ही मिल लेता। प्रकृति जो चाहती है वही होने देती है , उसे जो मानव को दिखानी थी वही दिखाई है जो नहीं दिखानी थी वह नहीं दिखाई है। जैसे हवा है बहुत सारी गैसें हैं अगर दिखने वाली चीजें होतीं तो दुनिया कैसी होती ? आप की भावनायें , आपकी आवाज, गंध अगर दिखने वाली चीजें होतीं तो दुनिया कैसी होती ? दुनिया संतुलित रहे इस बात का उसने पूरा ध्यान रखा है।
रतन का यह भी कहना था कि परमात्मा के नाम पर लोगों को धार्मिक जहर देना गलत है। अगर वह आपसे नहीं मिलना चाहता तो नहीं मिलेगा , आप चाहे जितना प्रयास कर लें।
रतन अब रिटायर हो चुका था। उसकी पत्नी अभी किसी माताजी की शिष्य बनी थी , जिनका कहना था कि वह वह साक्षात् देवी हैं , वह सारे दुखों का हरण कर के मोक्ष प्रदान करती हैं। लोग आंधी तूफान की तरह उस देवी के भक्त बन रहे थे। जब लोग माताजी के चरण स्पर्श कर रहे थे और उनके पूजन की तैयारी चल रही थी तभी वह स्टेज पर चढ़ गया था और माइक पर बोला , मोक्ष इनकी पॉकेट में नहीं रखा है ,जो आपको बाँट देंगी। आपको मोक्ष नहीं , आपके सब काम करने वाला एक नौकर चाहिए।
इतना बोलना ही उसकी दुर्गति का कारण बन गया था।
Saturday, 14 November 2015
Right Way of talking ,बात चीत का सही तरीका
बात चीत का सही तरीका
आप किसी के बारे में अगर सबसे ज्यादा जानना चाहें तो सिर्फ दो मिनट उससे बात करिये और उसका जीवन कैसा है , वह सुखी है , अमीर है या सफल है , आप सब कुछ जान सकते हैं। बात चीत का सही तरीका न केवल आपको सम्मान दिला सकता है बल्कि आप को कुछ भी बना सकता है।जब आप दो लोग आपस में बात कर रहे हों और कोई तीसरा आ कर आप की बात सुनने लगे या बीच में बोलने लगे तो कैसा लगता है ? या सवाल आप किसी से पूछें और जवाब कोई और दे , या कोई जबरदस्ती अपनी राय आप के ऊपर मढ़ने लगे, या आपकी बात पर ध्यान न दे और आपकी बात पूरी होने के पहले ही अपनी बात शुरू कर दे , तो कैसा लगता है ? बिलकुल अच्छा नहीं लगता है , आप ही नहीं किसी को भी अच्छा नहीं लगता है।
यह तरीका जीवन के व्यवहारिक पक्ष में कितना घातक हो सकता है ? इसका एक सत्य उदहारण मै देना चाहूँगा। मेरे एक रिश्तेदार हैं , मै उनका नाम पब्लिकली तो नहीं ले सकता , आप कुछ भी अपने से मान लीजिये। उनके माता जी का देहान्त हुआ तो , न तो कोई रिश्तेदार आया , न उनके मुहल्ले का कोई व्यक्ति लाश उठाने को तैयार हुआ , वह शाम तक रिश्तेदारों का इन्तजार करते रहे और जब कोई नहीं आया तो शाम को डेड बॉडी टेम्पो पर लाद कर घाट पर ले गए।
ऐसा क्यों हुआ ? जरा उनके बारे में जान लीजिये। वह ट्रेन में हों , बस में हों , घर में हों , रिश्तेदारी में हों या कहीं भी हों , उनके सामने किसी टॉपिक पर , कोई भी व्यक्ति , कोई चर्चा कर दे , तो उसको वे अपने लिए एक चैलेंज मान लेते हैं और उस पर तब तक बहस करते रहेंगे , जब तक सामने वाले को उठने या भागने पर मजबूर न कर दें , या उसे हरा न दें। पर आप जानते हैं उनके इन आदतों की वजह से हम सब उन से बातचीत में घबराने लगे , उनसे दूर होने लगे। वे अगर मोबाइल पर फ़ोन करते हैं तो मेरी पत्नी या बच्चे उनका फ़ोन नहीं उठाते , क्यों कि वे हर बात में से बात निकल कर बहस करने लगेंगे । मै उठाता हूँ तो , जैसे ही वह बातचीत लम्बा करने की कोशिश करते हैं , मुझे कहना पड़ जाता है कि , भइया मुझे कुछ जरूरी काम है , कुछ जरूरी बात पहले कर लीजिये और मै बरी हो लेता हूँ।
इसी तरह मै ही नहीं सब को बुरा लगा और वह इतनी बुरी स्थिति में आ गए , लेकिन आप क्या समझते हैं कि उन्हें कभी ये लगा कि वे कुछ गलत कर रहे हैं , नहीं उनके अनुसार लोग बुरे हैं।
अगर आप चाहते हैं कि लोग आपको पसंद करें तो बातचीत में यह सावधानियां अवश्य रखें -
१ - जब दो लोग कोई आपसी बात कर रहे हों तो शामिल होने की कोशिश न करें।
२ - किसी की बातचीत चुपके से न सुनें।
३ - आप तब तक अपनी राय न दें जब तक आपसे मांगी न जाय।
४ - सामने वाले की बात सुनें और समाप्त होने पर ही अपनी बात शुरू करें।
५ - हर बात में दखलन्दाजी न करें।
६ - किसी और से पूछे गए सवाल का जवाब आप न दें।
Friday, 13 November 2015
GEETA PART 6, गीता अंक 6
GEETA PART 6, गीता अंक 6, Shri Mad Bhagvat gita Part 6
श्लोक 4: । अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
। युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः।।
शब्दार्थ: युर्दोधन कहता है कि यहाॅ पाण्डवों की इस सेना मे भीम और अर्जुन जैसे युद्ध करने वाले बहुत सारे धनुर्धर और महारथी हैं, जैसे युयुधान , विराट और द्रुपद।
व्याख्या: पिछले श्लोकों मे दुर्योधन गुरू द्रोणाचार्य से बातचीत मे गुरू द्रोणाचार्य को अपनी वाक्पटुता से इस बात के लिये प्रेरित करता है कि पाण्डु पुत्र सिर्फ मेरे ही नही आप के भी दुश्मन हैं, कल आपने जिन जिन को युद्ध की कला सिखायी आज वही आप के खिलाफ धनुष लेकर तैयार हैं। उसकी जुगत यही है कि मै , गुरू द्रोणाचार्य को पाण्डु पुत्रों के खिलाफ इतना भड़का दूॅ कि वे , उनके वध मे जरा सा संकोच न करें।
इस श्लोक मे दुर्योधन तीन लोगों का नाम लेता है और उन्हे मामूली योद्धा नही बल्कि बलवान शूरवीर और युद्ध मे भीम और अर्जुन के समान बताता हैं।
वह पहले नाम लेता है युयुधान का , जिसका दूसरा नाम है सात्यकि। सात्यकि ने चॅू कि शस्त्र विद्या अर्जुन से सीखी थी , इस लिये वह अर्जुन के प्रति पहले से कृतज्ञ था , दूसरे सात्यकि की कृष्ण के प्रति बहुत ज्यादा आसक्ति थी इस लिये वह कृष्ण के नारायणी सेना के साथ न जा कर कृष्ण के साथ पाण्डवों की तरफ से युद्ध के मैदान मे था।
दुर्योधन दूसरा नाम लेता है , राजा विराट का , जब कि राजा विराट का दुर्योधन से कोई बैर भाव नही था पर वह राजा विराट का नाम क्यों लेता है ? वह यह सब उकसाने के लिये करता है, कि यह वही राजा विराट है जिसके कारण हमारा वीर सुशर्मा अपमानित हुआ और आप को सम्मोहन अस्त्र से सम्मोहित होना पड़ा और हम लोगों को युद्ध से भागना पड़ा।
राजा विराट का पाण्डवों से सम्बद्ध होने का एक विशेष कारण था, राजा विराट अर्जुन से विशेष प्रभावित थे और वे अपनी पुत्री का विवाह अर्जुन से करना चाहते थे पर अर्जुन ने उत्तरा को संगीत सिखाया था और वे उसे पुत्री भाव से देखते थे, इस लिये उन्होने उत्तरा का विवाह अपने पुत्र अभिमन्यु से करा दिया दिया। इस तरह राजा विराट अर्जुन के सम्बन्धी बन गये और इस कारण वे पाण्डवों की तरफ से युद्ध के मैदान मे थे।
दुर्योधन तीसरा नाम लेता है , राजा द्रुपद का, राजा द्रुपद और द्रोणाचार्य के अनबन के बारे मे पहले ही चर्चा हो चुकी है, पिछले अंक मे ।
गीता का शेष भाग अगले अंक मे -----
आज गीता का मनन और अनुपालन हमारे समाज के लिये ज्यादा आवश्यक हो गया है।
गीता की यह व्याख्या पसंद आये तो समाज हित मे शेयर करना न भूलें।
आपने पढ़ा , आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद।
। युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः।।
शब्दार्थ: युर्दोधन कहता है कि यहाॅ पाण्डवों की इस सेना मे भीम और अर्जुन जैसे युद्ध करने वाले बहुत सारे धनुर्धर और महारथी हैं, जैसे युयुधान , विराट और द्रुपद।
व्याख्या: पिछले श्लोकों मे दुर्योधन गुरू द्रोणाचार्य से बातचीत मे गुरू द्रोणाचार्य को अपनी वाक्पटुता से इस बात के लिये प्रेरित करता है कि पाण्डु पुत्र सिर्फ मेरे ही नही आप के भी दुश्मन हैं, कल आपने जिन जिन को युद्ध की कला सिखायी आज वही आप के खिलाफ धनुष लेकर तैयार हैं। उसकी जुगत यही है कि मै , गुरू द्रोणाचार्य को पाण्डु पुत्रों के खिलाफ इतना भड़का दूॅ कि वे , उनके वध मे जरा सा संकोच न करें।
इस श्लोक मे दुर्योधन तीन लोगों का नाम लेता है और उन्हे मामूली योद्धा नही बल्कि बलवान शूरवीर और युद्ध मे भीम और अर्जुन के समान बताता हैं।
वह पहले नाम लेता है युयुधान का , जिसका दूसरा नाम है सात्यकि। सात्यकि ने चॅू कि शस्त्र विद्या अर्जुन से सीखी थी , इस लिये वह अर्जुन के प्रति पहले से कृतज्ञ था , दूसरे सात्यकि की कृष्ण के प्रति बहुत ज्यादा आसक्ति थी इस लिये वह कृष्ण के नारायणी सेना के साथ न जा कर कृष्ण के साथ पाण्डवों की तरफ से युद्ध के मैदान मे था।
दुर्योधन दूसरा नाम लेता है , राजा विराट का , जब कि राजा विराट का दुर्योधन से कोई बैर भाव नही था पर वह राजा विराट का नाम क्यों लेता है ? वह यह सब उकसाने के लिये करता है, कि यह वही राजा विराट है जिसके कारण हमारा वीर सुशर्मा अपमानित हुआ और आप को सम्मोहन अस्त्र से सम्मोहित होना पड़ा और हम लोगों को युद्ध से भागना पड़ा।
राजा विराट का पाण्डवों से सम्बद्ध होने का एक विशेष कारण था, राजा विराट अर्जुन से विशेष प्रभावित थे और वे अपनी पुत्री का विवाह अर्जुन से करना चाहते थे पर अर्जुन ने उत्तरा को संगीत सिखाया था और वे उसे पुत्री भाव से देखते थे, इस लिये उन्होने उत्तरा का विवाह अपने पुत्र अभिमन्यु से करा दिया दिया। इस तरह राजा विराट अर्जुन के सम्बन्धी बन गये और इस कारण वे पाण्डवों की तरफ से युद्ध के मैदान मे थे।
दुर्योधन तीसरा नाम लेता है , राजा द्रुपद का, राजा द्रुपद और द्रोणाचार्य के अनबन के बारे मे पहले ही चर्चा हो चुकी है, पिछले अंक मे ।
गीता का शेष भाग अगले अंक मे -----
आज गीता का मनन और अनुपालन हमारे समाज के लिये ज्यादा आवश्यक हो गया है।
गीता की यह व्याख्या पसंद आये तो समाज हित मे शेयर करना न भूलें।
आपने पढ़ा , आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद।
Thursday, 12 November 2015
परमात्मा को नाराज न करें God will be Angry
हम अपने जीवन का ज्यादातर हिस्सा इसी उम्मीद में, इसी प्रयास में गुजार देते हैँ कि , लोग हमें जानें , लोगों का ध्यान हमारी तरफ आकर्षित हो। दुनिया भर में जितनी भी लड़ाइयाँ हुई है , वे सर्वाइवल के लिए कम और नाम कमाने के लिए ज्यादा हुई हैं। अगर हमारी निजी जरूरत न हो तो , हम एक सुई भी, तब ही हिलायेंगे जब , उसका हमें कोई सामाजिक लाभ हो रहा हो। बड़ा घर, बड़ी गाड़ी, सब इसी का बदला हुआ रूप है कि लोग हमें पहचाने, हमारा सामाजिक रुतबा हो, लोगों का ध्यान हमारी तरफ आकर्षित हो।
मै एक छोटा सा लेख अगर पोस्ट करता हूँ तो. मेरी तो यही इच्छा होती है कि दुनिया के सारे लोग उसे पढ़ें, वो अलग बात है कि ऐसा संभव नहीं है। ऐसा इस लिए है , क्यों कि यह मेरी कृति है। आप का छोटा बच्चा है, वह एक कागज का जहाज भी बनाता है तो, दस बार आप को दिखाने आएगा , उसका भी लक्ष्य यही होता है कि आप उसकी तरफ ध्यान दें , उसकी कृति को तवज्जो दें। यदि आपने या किसी ने भी , उसके जहाज यानि उसकी कृति को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की तो वह उससे नाराज हो जाता है।
जब आप , हम या एक बच्चा अपनी कृति की क्षति को बर्दास्त नहीं कर सकते तो हमारा परमात्मा अपनी कृति को क्षति ग्रस्त होते हुए कैसे बर्दास्त कर सकता है ? जब हम धार्मिक लड़ाइयों की खातिर लोगों की जानें लेते हैं , तो हम परमात्मा की कृति को क्षति ग्रस्त करते हैं जो परमात्मा को नाराज करता है।
अब आप कह सकते हैं कि पशु पक्षी तो रोज ही अपने भोजन की खातिर परमात्मा की कृति को क्षति ग्रस्त करते हैं , आप बिल्कुल सही कह रहे हैं , पर वे परमात्मा की कृति को क्षति ग्रस्त करने के बजाय एक प्राकृतिक संतुलन पैदा कर रहे हैं। अगर ऐसा न हो पूरा समुद्र मछलियों से भर जाय , पूरी धरती मनुष्यों के बजाय कीड़ों मकोडों और पशु पक्षियों से भर जाय।
धर्म के नाम पर हत्याएँ बंद करिये , धर्म के ठेकेदारों का पीछा छोड़ कर खुद से ज्ञान प्राप्त करिये और आनंद की प्राप्ति करिये। वरना परमात्मा की कृति को क्षति ग्रस्त करना हम सब पर भारी पड़ सकता है , वह कभी भी नाराज हो सकता है , और नाराज होता ही है , हमारे पास ऑंखें होनी चाहिए उसका कोप देखने के लिए।
Tuesday, 10 November 2015
Happy Deepawawali, an emotional story

शिवा के घर में आज ज्यादा चहल पहल थी । आज दीपावली जो थी । घर में सब थे, बूढ़े मां-बाप, पत्नी दो बच्चे एक लड़का एक लड़की । दोनों अपनी पढ़ाई पूरी कर के जॉब पर लग गए थे। बच्चे आते समय अपने मम्मी पापा के लिए, दादा दादी के लिए गिफ्ट लाना नहीं भूलते थे, सब के लिए कपड़े हो कुछ और जरुरत के सामान जरूर लाते थे, दीपक और दिव्या नाम थे शिवा के बच्चों का। दीपक बिल्कुल दीपक की तरह, घर और खानदान का नाम रोशन कर रहा था । अपनी B.Tech की पढ़ाई पूरी कर के मल्टीनेशनल कंपनी में लग गया था, दिव्या भी कुछ कम नहीं थी वह CA की पढ़ाई पूरी कर के Pune की किसी कंपनी में लग गई थी। कुल मिलाकर एक संतुलन बन गया था, सब बहुत खुश थे, शिवा के मां-बाप भी अभी ज्यादा बूढ़े तो नहीं थे पर उनको बुढ़ापे वाली बीमारी थी।
शिवा का जीवन इस समय एक दम खुशहाल था , आर्थिक स्थिति बहुत बढ़िया थी, बाबूजी का पेंशन, खुद एक मिल श्रमिक की तनख्वाह , बच्चों की सैलरी मिलाकर अच्छी Income थी। सबने मिल कर इस धनतेरस पर एक कार खरीद लिया था, सब बहुत खुश थे सबको आज दीपावली के दिन किसी धार्मिक स्थल पर अपनी फैमिली कार से ड्राइव पर जाना था, सब अपने-अपने नए कपड़े पहन कर तैयारी बना रहे थे , शिवा माला को बार-बार किसी न किसी काम के लिए आवाज दे रहा था, माला शिवा की पत्नी का नाम था, आज माला भी बहुत खुश थी Excited थी , * आज शिवा के किसी भी कॉल पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही थी, नहीं तो शिवा के ज्यादा आवाज लगाने पर कुछ न कुछ speech देती , माला शिवा के नए जूते और कपड़े लायी , तुम किसी महाराजा की तरह लग रहे हो जी, माला शिवा की तारीफ में बोले जा रही थी खुशी और excitement में बोले जा रही थी, शिवा, सिवाय मुस्कुराने के कुछ नहीं कह रहा था , तभी माला से शायद कुछ गलती हो गई , उसने कहा सुनते हो जी, मेरे भैया ने, भाभी से झगड़ा कर लिया है , और कह रहे है, दीपावली के बाद संयास ले लूंगा, शिवा अब तक शांत था और मुस्कुरा रहा था, बोला, वह सन्यास नहीं लेंगे, सन्यास उनके बस का नहीं है, जिसको संयास लेना होता है वह कहता नहीं है, माला ने कहा, जैसे तुमको लेना हो, तो ले ही लोगे, शिवा बोला तो कुछ नहीं पर जैसे ही माला अंदर गई वह संयास के लिए चल पड़ा। अपने पीछे एक note छोड़ गया, आप सबको हैप्पी दीपावली। यह दीपावली मेरे लिए कुछ ज्यादा ही खास है, मैं उसको खोजने जा रहा हूं जो अंदर जलता है] अंतरात्मा में। तुम सब ना परेशान होना , ना ढूंढने की कोशिश करना, परमात्मा का शुक्रगुजार होना
जिन्होंने मुझे वह power दिया, कि मैं असली दीपक से दीपावली मना सकूं, दीपावली का आनंद मनाओ खुश रहो मैंने आज से अभी से सन्यास धारण कर लिया है , अब पूरा गगन और पूरी] धरती मेरे पिता और मां है,
और पूरी दुनिया के लोग मेरा रिश्तेदार है, सन्यास वही धारण कर सकता है जो स्वस्थ हो संपन्न हो और आर्शीवादित हो। आज अमावस्या की रात मुझे अन्तरात्मा का दीपक जलाने दो।
Saturday, 7 November 2015
Thursday, 5 November 2015
Monday, 2 November 2015
गीता अंक 3 GEETA PART 3
महाभारत यानि एकता की कमी और अहंकार की अधिकता
प्रथम अध्याय:श्लोक 1: धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
ममकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।
शब्दार्थ: धृतराष्ट्र संजय से कहते हैं-
हे संजय! धर्मभूमि कुरूक्षेत्र मे, युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुये मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
श्लोक 2: । दृष्टा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
। आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ।।
शब्दार्थ: अब दूसरे श्लोक मे संजय, धृतराष्ट के प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं कि हे महाराज , पाण्डु पुत्रो के द्वारा रचे गये सेना की बज्रव्यूह रचना को देख कर राजा, दुर्योधन गुरू द्रोणाचार्य के पास गये और ये वचन बोले-
व्याख्याः-यह प्राकृतिक नियम है कि , जहाॅ जहाॅ भी आपसी मतभेद होता है वहाॅ शक्ति और प्रभाव भी पूरा नही पड़ता है। कौरवों और पाण्डवों मे यही नीतिगत अन्तर था जहाॅ पाण्डवों की सेना थोड़ी होते हुये भी संगठित थी, एकमत थी और एक ही भाव से खड़ी थी वहीं कौरवों की सेना मे अलग अलग मत थे। कौरव बन्धु तो युद्ध चाहते थे पर गुरू द्रोण, भीष्म और विकर्ण आदि युद्ध नही करना चाहते थे क्यों कि उन्हे लगता था कि यह युद्ध मानवता विरोधी है, अनैतिक है। जहाॅ पाण्डवों के पक्ष मे भगवान श्रीकृष्ण थे और धर्म था वहीं दुर्योधन सदैव से ही छल कपट और अनीति से युद्ध जीतना चाहता था।
दुर्योधन के पास बड़ी सेना थी, एक से बढ़ कर एक धुरंधर वीर थे, पर वे मन से एक नही थे, वह यह बात जानता था, इस लिये जब उसने पाण्डवों का बज्रव्यूह देखा तो वह अन्दर से हिल गया और गुरू द्रोणाचार्य के पास जाता है पर उसका अहंकार अभी भी उसके साथ है। उसे जाना तो चाहिये था मंत्रणा और आदेश के लिये पर वह राजा के भाव से युद्ध का आदेश देने जाता है। उसके मन मे अभी भी छल है वह अभी भी द्रोणाचार्य को कौरवों के प्रति उकसाने के मकसद से जाता है जब कि द्रोणाचार्य के पास युधिष्ठर भी जाते हैं, वे अपने समस्त अहंकार त्याग कर, राजा के समस्त लक्षण त्याग कर और अपने दोनो हाथों को जोड़ कर द्रोणाचार्य के पास युद्ध की अनुमति लेने जाते हैं।
अब हम यहाॅ देख सकते हैं कि दोनों के स्वभाव कितने विपरीत हैं तो परिणाम तो विपरीत होना ही था। इसी लिये कहा गया है कि सदैव उसका साथ देना चाहिये जो धर्मानुकूल व्यवहार करता हो , भले ही वह क्षणिक रूप से कमजोर ही क्यों न हो ?
शेष अगले अंक मे -----
आज गीता का मनन और अनुपालन हमारे समाज के लिये ज्यादा आवश्यक हो गया है।
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