GEETA PART 6, गीता अंक 6, Shri Mad Bhagvat gita Part 6
श्लोक 4: । अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
। युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः।।
शब्दार्थ: युर्दोधन कहता है कि यहाॅ पाण्डवों की इस सेना मे भीम और अर्जुन जैसे युद्ध करने वाले बहुत सारे धनुर्धर और महारथी हैं, जैसे युयुधान , विराट और द्रुपद।
व्याख्या: पिछले श्लोकों मे दुर्योधन गुरू द्रोणाचार्य से बातचीत मे गुरू द्रोणाचार्य को अपनी वाक्पटुता से इस बात के लिये प्रेरित करता है कि पाण्डु पुत्र सिर्फ मेरे ही नही आप के भी दुश्मन हैं, कल आपने जिन जिन को युद्ध की कला सिखायी आज वही आप के खिलाफ धनुष लेकर तैयार हैं। उसकी जुगत यही है कि मै , गुरू द्रोणाचार्य को पाण्डु पुत्रों के खिलाफ इतना भड़का दूॅ कि वे , उनके वध मे जरा सा संकोच न करें।
इस श्लोक मे दुर्योधन तीन लोगों का नाम लेता है और उन्हे मामूली योद्धा नही बल्कि बलवान शूरवीर और युद्ध मे भीम और अर्जुन के समान बताता हैं।
वह पहले नाम लेता है युयुधान का , जिसका दूसरा नाम है सात्यकि। सात्यकि ने चॅू कि शस्त्र विद्या अर्जुन से सीखी थी , इस लिये वह अर्जुन के प्रति पहले से कृतज्ञ था , दूसरे सात्यकि की कृष्ण के प्रति बहुत ज्यादा आसक्ति थी इस लिये वह कृष्ण के नारायणी सेना के साथ न जा कर कृष्ण के साथ पाण्डवों की तरफ से युद्ध के मैदान मे था।
दुर्योधन दूसरा नाम लेता है , राजा विराट का , जब कि राजा विराट का दुर्योधन से कोई बैर भाव नही था पर वह राजा विराट का नाम क्यों लेता है ? वह यह सब उकसाने के लिये करता है, कि यह वही राजा विराट है जिसके कारण हमारा वीर सुशर्मा अपमानित हुआ और आप को सम्मोहन अस्त्र से सम्मोहित होना पड़ा और हम लोगों को युद्ध से भागना पड़ा।
राजा विराट का पाण्डवों से सम्बद्ध होने का एक विशेष कारण था, राजा विराट अर्जुन से विशेष प्रभावित थे और वे अपनी पुत्री का विवाह अर्जुन से करना चाहते थे पर अर्जुन ने उत्तरा को संगीत सिखाया था और वे उसे पुत्री भाव से देखते थे, इस लिये उन्होने उत्तरा का विवाह अपने पुत्र अभिमन्यु से करा दिया दिया। इस तरह राजा विराट अर्जुन के सम्बन्धी बन गये और इस कारण वे पाण्डवों की तरफ से युद्ध के मैदान मे थे।
दुर्योधन तीसरा नाम लेता है , राजा द्रुपद का, राजा द्रुपद और द्रोणाचार्य के अनबन के बारे मे पहले ही चर्चा हो चुकी है, पिछले अंक मे ।
गीता का शेष भाग अगले अंक मे -----
आज गीता का मनन और अनुपालन हमारे समाज के लिये ज्यादा आवश्यक हो गया है।
गीता की यह व्याख्या पसंद आये तो समाज हित मे शेयर करना न भूलें।
आपने पढ़ा , आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद।
। युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः।।
शब्दार्थ: युर्दोधन कहता है कि यहाॅ पाण्डवों की इस सेना मे भीम और अर्जुन जैसे युद्ध करने वाले बहुत सारे धनुर्धर और महारथी हैं, जैसे युयुधान , विराट और द्रुपद।
व्याख्या: पिछले श्लोकों मे दुर्योधन गुरू द्रोणाचार्य से बातचीत मे गुरू द्रोणाचार्य को अपनी वाक्पटुता से इस बात के लिये प्रेरित करता है कि पाण्डु पुत्र सिर्फ मेरे ही नही आप के भी दुश्मन हैं, कल आपने जिन जिन को युद्ध की कला सिखायी आज वही आप के खिलाफ धनुष लेकर तैयार हैं। उसकी जुगत यही है कि मै , गुरू द्रोणाचार्य को पाण्डु पुत्रों के खिलाफ इतना भड़का दूॅ कि वे , उनके वध मे जरा सा संकोच न करें।
इस श्लोक मे दुर्योधन तीन लोगों का नाम लेता है और उन्हे मामूली योद्धा नही बल्कि बलवान शूरवीर और युद्ध मे भीम और अर्जुन के समान बताता हैं।
वह पहले नाम लेता है युयुधान का , जिसका दूसरा नाम है सात्यकि। सात्यकि ने चॅू कि शस्त्र विद्या अर्जुन से सीखी थी , इस लिये वह अर्जुन के प्रति पहले से कृतज्ञ था , दूसरे सात्यकि की कृष्ण के प्रति बहुत ज्यादा आसक्ति थी इस लिये वह कृष्ण के नारायणी सेना के साथ न जा कर कृष्ण के साथ पाण्डवों की तरफ से युद्ध के मैदान मे था।
दुर्योधन दूसरा नाम लेता है , राजा विराट का , जब कि राजा विराट का दुर्योधन से कोई बैर भाव नही था पर वह राजा विराट का नाम क्यों लेता है ? वह यह सब उकसाने के लिये करता है, कि यह वही राजा विराट है जिसके कारण हमारा वीर सुशर्मा अपमानित हुआ और आप को सम्मोहन अस्त्र से सम्मोहित होना पड़ा और हम लोगों को युद्ध से भागना पड़ा।
राजा विराट का पाण्डवों से सम्बद्ध होने का एक विशेष कारण था, राजा विराट अर्जुन से विशेष प्रभावित थे और वे अपनी पुत्री का विवाह अर्जुन से करना चाहते थे पर अर्जुन ने उत्तरा को संगीत सिखाया था और वे उसे पुत्री भाव से देखते थे, इस लिये उन्होने उत्तरा का विवाह अपने पुत्र अभिमन्यु से करा दिया दिया। इस तरह राजा विराट अर्जुन के सम्बन्धी बन गये और इस कारण वे पाण्डवों की तरफ से युद्ध के मैदान मे थे।
दुर्योधन तीसरा नाम लेता है , राजा द्रुपद का, राजा द्रुपद और द्रोणाचार्य के अनबन के बारे मे पहले ही चर्चा हो चुकी है, पिछले अंक मे ।
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आज गीता का मनन और अनुपालन हमारे समाज के लिये ज्यादा आवश्यक हो गया है।
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