Monday, 2 November 2015

गीता अंक 3 GEETA PART 3


महाभारत यानि एकता की कमी और अहंकार की अधिकता
प्रथम अध्याय:श्लोक 1: धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
  ममकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।
शब्दार्थ: धृतराष्ट्र संजय से कहते हैं-
हे संजय! धर्मभूमि कुरूक्षेत्र मे, युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुये मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
श्लोक 2:  । दृष्टा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
       । आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ।।
शब्दार्थ:  अब दूसरे श्लोक मे संजय, धृतराष्ट के प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं कि हे महाराज , पाण्डु पुत्रो के द्वारा रचे गये सेना की बज्रव्यूह रचना को देख कर राजा, दुर्योधन गुरू द्रोणाचार्य के पास गये और ये वचन बोले-
व्याख्याः-यह प्राकृतिक नियम है कि , जहाॅ जहाॅ भी आपसी मतभेद होता है वहाॅ शक्ति और प्रभाव भी पूरा नही पड़ता है। कौरवों और पाण्डवों मे यही नीतिगत अन्तर था जहाॅ पाण्डवों की सेना थोड़ी होते हुये भी संगठित थी, एकमत थी और एक ही भाव से खड़ी थी वहीं कौरवों की सेना मे अलग अलग मत थे। कौरव बन्धु तो युद्ध चाहते थे पर गुरू द्रोण, भीष्म और विकर्ण आदि युद्ध नही करना चाहते थे क्यों कि उन्हे लगता था कि यह युद्ध मानवता विरोधी है, अनैतिक है। जहाॅ पाण्डवों के पक्ष मे भगवान श्रीकृष्ण थे और धर्म था वहीं दुर्योधन सदैव से ही छल कपट और अनीति से युद्ध जीतना चाहता था।
दुर्योधन के पास बड़ी सेना थी, एक से बढ़ कर एक धुरंधर वीर थे, पर वे मन से एक नही थे, वह यह बात जानता था, इस लिये जब उसने पाण्डवों का बज्रव्यूह देखा तो वह अन्दर से हिल गया और  गुरू द्रोणाचार्य के पास जाता है पर उसका अहंकार अभी भी उसके साथ है। उसे जाना तो चाहिये था मंत्रणा और आदेश के लिये पर वह राजा के भाव से युद्ध का आदेश देने जाता है। उसके मन मे अभी भी छल है वह अभी भी द्रोणाचार्य को कौरवों के प्रति उकसाने के मकसद से जाता है जब कि द्रोणाचार्य के पास युधिष्ठर भी जाते हैं, वे अपने समस्त अहंकार त्याग कर, राजा के समस्त लक्षण त्याग कर और अपने दोनो हाथों को जोड़ कर द्रोणाचार्य के पास युद्ध की अनुमति लेने जाते हैं।
अब हम यहाॅ देख सकते हैं कि दोनों के स्वभाव कितने विपरीत हैं तो परिणाम तो विपरीत होना ही था। इसी लिये कहा गया है कि सदैव उसका साथ देना चाहिये जो धर्मानुकूल व्यवहार करता हो , भले ही वह क्षणिक रूप से कमजोर ही क्यों न हो ?
शेष अगले अंक मे -----
आज गीता का मनन और अनुपालन हमारे समाज के लिये ज्यादा आवश्यक हो गया है।
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