Monday, 16 November 2015

OUR WORLD हमारी दुनिया

 OUR WORLD , GOD AND CREATIVITY , WORSHIP AND GOD , GOD AND FRAUD
उसका , एक काल्पनिक रतन का पूरा बदन टूट रहा था , उसके , शरीर की एक एक माँस पेशियाँ दर्द से कराह रही थी। उसे उसकी पत्नी ने घर से निकाल दिया था , लोगों ने बहुत मारा था , पुलिस ने उसे मार कर लॉक अप में बंद कर दिया था। वह बेहोश हो गया था। जब उसकी चेतना धीरे धीरे वापस आई तो उसे क्रमशः एक एक चीज याद आने लगा और वह सोचने पर मजबूर हो गया -
कैसे हैं लोग , लोगों की मित्रता और उनकी दुनिया ? कैसे हैं ये रिश्तों के बाज़ार ? जो सिर्फ एक शब्द पर बिखर जाते हैं। सब ने क्या नकली प्यार और जज्बात का चादर ओढ़ रखा है ? क्या सब अंदर से हिंसक हैं ?
जो अप्रत्यक्ष है , अन्जान है , जिसके बारे में बहुत सी शंकाएँ हैं , जो सत्य है या भ्रम है उसके लिए अपने ही लोगों ने उसे बहुत मारा , जलाने  की कोशिश की।  उस अप्रत्यक्ष के लिए एक प्रत्यक्ष जीते जागते भावपूर्ण इन्सान के साथ इतना बुरा व्यव्हार ?
रतन ने जीवन भर कानपुर की एक फैक्ट्री में काम किया था , उसने काम को अपना भगवन मान लिया था। उसे भगवान , देवी देवता , मूर्ति फोटो , हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई और न जाने कितने ३६५ धर्म समझ नहीं आते थे।  शिफ्ट , ओवर टाइम और समय से ड्यूटी आना जाना यही उसकी दुनिया थी।
परमात्मा , सृष्टि कर्ता , अल्लाह , जीसस सब के बारे में उसकी एक ही राय थी कि जिसे आप कल्पना कर सकें , जिसका आप निर्माण कर सकें , वह परमात्मा हो ही नहीं सकता , वह किसी लिमिट या दायरे में आ  ही नहीं सकता , आप जहाँ भी हैं , जिसमे भी है सब परमात्मा है। इसके अलावा उसे किसी परमात्मा या धर्म कर्म से कोई मतलब नहीं  था।  वह अपनी कमाई अपनी पत्नी को सौंप देता था  , वही घर चलाती थी।
कभी कभी इस बात पर रतन की अपनी पत्नी से झड़प भी हो जाती , वह कहता ,जब  परमात्मा तुम से छुप रहा है तो क्यों उसे ढूढ़ रही हो ? अगर उसे मानव के साथ मिलना होता तो वह खुद ही मिल लेता। प्रकृति जो चाहती है वही होने देती है  , उसे जो मानव को दिखानी  थी  वही  दिखाई  है जो नहीं दिखानी थी  वह नहीं दिखाई है। जैसे हवा है बहुत सारी गैसें हैं अगर दिखने वाली चीजें होतीं तो दुनिया कैसी होती ? आप की भावनायें , आपकी आवाज, गंध  अगर दिखने  वाली चीजें होतीं तो दुनिया कैसी होती ? दुनिया संतुलित रहे इस बात का उसने पूरा ध्यान  रखा है।
रतन का यह भी कहना था कि परमात्मा के नाम पर लोगों को धार्मिक जहर देना गलत है। अगर वह आपसे नहीं मिलना चाहता तो नहीं मिलेगा , आप चाहे जितना प्रयास कर लें।
रतन अब रिटायर हो चुका  था।  उसकी पत्नी  अभी किसी माताजी की शिष्य बनी थी , जिनका कहना  था कि वह  वह साक्षात् देवी हैं , वह सारे दुखों का हरण कर के मोक्ष प्रदान करती हैं। लोग आंधी तूफान की तरह उस देवी के भक्त बन रहे थे। जब लोग माताजी के चरण स्पर्श कर रहे थे और उनके पूजन की तैयारी चल रही थी तभी वह स्टेज पर चढ़ गया था और माइक पर बोला , मोक्ष इनकी पॉकेट में नहीं रखा है ,जो आपको बाँट देंगी। आपको मोक्ष नहीं , आपके सब काम करने वाला एक नौकर चाहिए।  
इतना बोलना ही उसकी दुर्गति का कारण बन गया था। 

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