Monday, 28 September 2015

आकाक्षांये अनन्त हैं।

एक राजा यूॅ ही एक दिन, मन किया और बिना फौज फाटे के घूमने निकल लिया। कुछ दूर जाने के बाद, एक गाॅव के बाहर एक बुढि़या हाथ मे एक पात्र लिये खड़ी थी और उस पात्र से कुछ बुदबुदा रही थी। राजा कुतूहल बस वहाॅ रूक गया, और बुढि़या को देखने लगा। बुढि़या के पात्र और व्यवहार दोनो ही अजीब थे। राजा को देख कर बुढि़या ने अपना सिर ऊपर उठाया और राजा की तरफ प्रश्नवाचक निगाहों से देखा। राजा ने कहा “ये तुम्हारे हाथ मे कैसा अजीब पात्र है? और तुम यहाॅ क्या कर रही हो ?“ बुढि़या ने कहा “मेरे हाथ मे ये भिक्षा पात्र है, जिसे आज तक कोई भर नही पाया है, मेरे भी मरने के दिन नजदीक हैं और मै यहाॅ खड़ी हो कर अपने पति को बता रही थी कि मुझे भी खाली हाथ ही मरना पड़ेगा, ये पात्र कोई भर नही पायेगा।“ राजा को बड़ा विस्मय हुआ उसने बुढि़या से कहा “कि ये तेरा छोटा सा तो पात्र है, कैसे नही भरेगा ? तू सही जगह माॅगने नही गयी होगी। मै यहाॅ का राजा हॅू तू कल सूर्योदय होते ही मेरे महल के बाहर आ जाना, मै प्रातः भ्रमण को जाते समय तेरा पात्र हीरे मोतियों से भर दॅूगा।“ बुढि़या ने कहा “महाराज एक बार और सोच लीजिये मै कल आखिरी बार भिक्षाटन को निकलॅूगी और खाली पात्र के साथ वापस न आ सकूूॅगी, या तो भरे पात्र के साथ आऊॅगी या फिर वहीं मर जाऊॅगी।“ राजा ने कहा ”इसमे सोचने जैसा कुछ नही है, तुम कल आ जाना।”
राजा के लिये किसी भिखारी को भिक्षा देना छोटी मोटी बात थी, वह महल गया, दिन भर अपना काम काज किया और अपना वादा भूल भी गया और आराम से सो गया। सुबह वह पा्रतः भ्रमण के लिये महल के बाहर कदम ही रखा था वह बुढि़या राजा को नजर आ गयी, साथ ही उसको दिया गया अपना वादा भी। उसने एक चाकर को को भेज कर खजाॅची को बुला लिया और बोला ” इस बुढि़या का भिक्षा पात्र अशर्फियों से भर दो।”
राजा जब भ्रमण से लौटा तो देखा उसके महल के बाहर पूरी भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी। सारे दरबारी भी आ चुके थे और बुढि़या को वापस जाने को मना रहे थे, पर उसकी जिद थी कि वह भरा पात्र ही ले कर जायेगी, राजा ने उससे वादा किया है। राजा ने दरबारियों से पूछा ”क्या मेरा खजाना खाली हो गया है जो तुम लोगों ने इतना तमाशा बना दिया है ?” खजाॅची ने कहा ”महाराज आप अपना वादा तोड़ दीजिये नही तो सचमुच खजाना खाली हो जायेगा, इसके पात्र मे चाहे जितना डालता हॅू वह कुछ न कुछ खाली ही रह जा रहा है।” राजा ने ”कहा मेरे सामने भरो मै भी देखता हॅू।” राजा अपनी जिद की वजह से दोपहर तक कंगाल हो गया। सब कुछ उस पात्र मे डाला जा चुका था, पर उसका कुछ भाग अभी भी खाली था।
राजा अब परास्त हो चुका था। उसने बुढि़या के पैरों मे अपना सिर रख दिया और बोला ”मै राजा होने के अहंकार मे इसे भरने की कोशिश करता रहा, पर मै अब हार गया। मुझे अफसोस है कि मै अपना वादा नही पूरी कर पाया, पर ये तो बता दो कि इस पात्र का क्या राज है ?
बुढि़या ने कहा ”ये पात्र नही मेरे पति की खोपड़ी है, जो रात दिन पैसा पैसा करते, दिन रात मेहनत करते करते, समय से पहले चल बसा। उसकी याद सदैव बनी रहे इस लिये उसकी खोपड़ी मैने अपने पास रख ली, और अब उसी मे भिक्षा माॅग रही हॅू।”
राजा को समझ आ चुका था कि मानव की खोपड़ी ही ऐसी है, उसकी इच्छायें इतनी अनन्त हैं कि चाहे पूरी प्थ्वी की दौलत इसमे डाल दी जाये पर ये सन्तुष्ट कभी नही होगी, कभी नही भरेगी।

Sunday, 27 September 2015

सब से खतरनाक रोग

वो मेरा सबसे अच्छा दोस्त था, उसके पिता टीचर थे, और ये उनकी एक मात्र सन्तान थी। हमारे उसके नम्बर लगभग बराबर आते थे, जब हम थोड़े और ऊपर के क्लास मे गये तो अंकल ने उसके मन मे ये भरना शुरू कर दिया कि ”हर काम मे एक नमबर आना जरूरी है।“ अब वो मेरे साथ खेलने भी नही जाता था क्यों कि उसे हमेशा नम्बर एक की तैयारी जो करनी रहती थी। क्लास मे सबसे पहले आना, टीचर कुछ भी पूछे तो सबसे पहले जबाब देना, फिर सबसे पहले वापस अपने घर पहॅुच जाना। चैदह साल की उम्र तक आते आते अंकल उस के ऊपर पूरी तरह छा गये थे। रात मे दस ग्यारह बजे तक पढ़ाई करना, सबेरे पाॅच बजे उठना, पढ़ना, जागिंग, एक्सरसाइज और फिर स्कूल। रात दिन नम्बर एक के सुझावों से वह, नम्बर एक के प्रति सम्मोहित हो चुका था। अब वाकई हर क्षेत्र मे उसके रिजल्ट भी नम्बर एक आना शुरू हो गये थे, लेकिन मैने अंकल को देखा तब भी वो हर दम किसी न किसी से उसकी तुलना करते ही रहते थे और, उसे और अच्छा करने के लिये डाॅटते रहते थे।
हम इन्टरमीडियेट मे पहुॅच गये थे, मै अक्सर अपने सबसे अच्छे दोस्त से बात करने का मौका ढूॅढते रहता था पर हम लोग ज्यादा बात नही कर पाते थे, पर उस दिन वह मुझसे खुद मिलने आया और बताया कि वह कल अपने मामा की बेटी की शादी मे जा रहा है। वह वाकई मे बहुत उत्तेजित था। सालों बाद मैने उसके चेहरे पर गजब की खुशी देखी थी। पर कौन जानता है कि कल के गर्भ मे क्या है ? कल हम मिले लेकिन जिला अस्पताल मे। नम्बर एक की आदत ने उसे सबसे आखिर की लाइन मे खड़ा कर दिया था जहाॅ से न कोई आगे जा सकता था न ही पीछे। सबसे पहले Train मै पकड़ लॅू, इस इच्छा से वह Train रूकने के पहले ही Train मे घुसने लगा था, पर उसका पैर स्लिप कर गया था। उसका पैर Train के पहियों के नीचे आ कर कट गया था। खून ज्यादा बहने के कारण और पैर मे इन्फेक्शन फैल जाने के कारण डाक्टर उसे बचा न सके थे।
जब मै उससे मिलने गया तो उसे समय बड़ा ही दर्दनाक मंजर हो गया था। वह मेरा पैर पकड़ने की कोशिश करने लगा था “बचा ले मेरे दोस्त, मुझे तुझसे बहुत सी बातें करनी है, तेरे साथ खेलना है।” अंकल इधर उधर पागलों की तरह भाग रहे थे उनकी जुबान पर बस एक ही रट थी ”हे परमात्मा बचा ले मेरे बेटे को , नही चाहिये मुझे नम्बर एक, मुझे बस मेरा बेटा वापस कर दे।“ पर अब शायद बहुत देर हो चुकी थी, थोड़ी ही देर मे नम्बर एक, नम्बर जीरो बन गया था।
बहुत बाद मे सुनने को मिला कि अण्टी ने दुख और अवसाद मे अंकल से तलाक ले लिया और जल्दी ही चल बसीं।
समाज का सबसे खतरनाक रोग जानते है क्या है ? रेस, उन चीजों के लिये जो अपने पास नही है। अपनी 75 प्रतिशत नियामतों के लिये परमात्मा को धन्यवाद न दे कर उन 25 प्रतिशत भाग के लिये रोना, चिन्तित होना जो अपने पास नही है, और यही सारे रोगों का जड़ है। छोड़ दीजिये 25 प्रतिशत के लिये रोना, भागना और मनाना शुरू कर दीजिये 75 प्रतिशत का जश्न और देखिये आप के जीवन से रोग भाग जाते हैं कि नही। बन्द कर दीजिये परमात्मा को, माॅ बाप को , समाज को कोसना, उन्हे उनकी अज्ञानता के लिये क्षमा कर दीजिये और सीख लीजिये दिल से खुश रहना और फिर देखिये फर्क पड़ता है कि नही। अपने को 75 प्रतिशत खुशी देना शुरू करिये, बाकी के 25 प्रतिशत खुशी ख्ुाद चल कर आप के पास आ जायेंगे। यही नियम है, और ये कभी गलत नही होता।

Saturday, 26 September 2015

आप की चिन्तायें व्यर्थ हैं


हम सब चिन्तित होते हैं। चिन्तायें स्वाभाविक भी हैं, लकिन यदि आप चाहते हैं कि आप का आने वाला कल एक दम बेहतरीन हो तो इसके लिये जो सबसे बढि़या तरीका है वह ये है कि आप अपनी सारी युक्ति आज के काम को बेहतरीन बनाने मे लगा दें, आज खुश रहने मे लगा दें। कल छुपा है आज के पेट मे। आज ठीक है तो कल भी ठीक रहेगा, लेकिन आज आप, कल के लिये चिन्तित हो कर, कल को ठीक करना चाहते हैं, सुधारना चाहते हैं तो कल कभी नही सुधार पायेंगे क्यों कि हर दिन आप यही सोचते हैं कि कल खुश हो लूॅगा, और वो कल कभी नही आता है। आप के चिन्ता करने से कोई चीज समय से पहले आप को मिल गयी है  या आप के चिन्ता करने से कोई दुर्घटना टल गयी ? नही न, फिर इसी लिये मै एक बार और कहता हॅू, आप का चिन्ता करना बेकार है, आप के सेहत के साथ खिलवाड, है। उन चीजों का आनन्द लीजिये जो अभी आप के पास है, तभी हमारा दाता ये समझ पाता है कि यह बन्दा खुश रहता है इसके जीवन मे ऐसी परिस्थितियाॅ पैदा करो कि ये खुश ही रहे, इसकी यही चाहत है। जब कोई बर्तमान मे रोता ही रहता है, तब हमारा दाता ये समझता है कि इसकी यही चाहत है, इसके जीवन मे ऐसी ही परिस्थितियाॅ रहने दो। जो आप सोचते हैं जो आप करते हैं, उसी के अनुरूप आप के जीवन का निर्माण होता रहता है।
जब ला आफ अट्रैक्शन  कहता है कि इस दुनिया मे हर चीज प्रचुर मात्रा मे है तो हम मानते ही नही और अपनी गणित लगा लगा कर सदैव बेचैन और चिन्तित होते रहते है। प्रकृति ने आप के चिन्तित होने के लिये कोई वजह नही छोड़ा है, लेकिन आपको दुखी होने का, गुस्सा करने का, चिन्तित होने का, कोई न कोई बहाना मिल ही जाता है। आप दुख दर्शी हैं, इस लिये आप को गुलाब की खुबसूरती, बच्चों की मधुर मुस्कान, प्रकृति की सुन्दर मनमोहक शाम, लहलहाते खेत इन सब मे भी आप को सुख नही नजर आता है। जवान जवान बच्चों के चेहरों की मुर्दानगी और झुर्रियाॅ उनके जीवन के सघंर्ष को बयान कर देती है। कहाॅ है उनके जीवन मे आनन्द, और मस्ती ? पर मै अब भी कहता हॅू आप कल की चिन्ता छोड़ दीजिये, सुकरात कहता है ”कल का कोई विचार मत करो क्यों कि कल अपना विचार खुद कर लेगा।“
अब सूरज की किरणों से तरल ईंधन बनाया जा सकेगा, ऐसा सफल प्रयास हावर्ड मेडिकल स्कूल की पामेला रजत नामक रसायनशास्त्री ने किया है। हाॅलाकि अभी इसकी दक्षता 1 प्रतिशत है पर भविष्य मे 5 प्रतिशत तक ले जाने की सम्भावना है। अगर ऐसा हो पाया तो तो हम मुफ्त मिलने वाले अथाह सूरज की किरणों को उसके दूसरे फार्म मे, एक तरह से स्टोर कर सकेंगे। आने वाले ऊर्जा संकट का बहुत सा भाग हल हो सकेगा। इसी लिये मै कहता हॅू कि चिन्ता करने का काम प्रकृति पर छोड़ दीजिये, आप की जरूरत  पर प्रकृति आप को वह रास्ता दिखा देगी, कि आप अपनी जरूरत की चीज ढूॅढ लेंगे। आप देखो न,  प्रकृति मे मौजूद तो हर चीज थी लेकिन वह तब आप को मिली, जब आप उस के लायक बन सके, हर आपकी जरूरत की चीज क्रमशः आप को मिलती जा रही है। सारे आविष्कार क्रमशः हो रहे हैं। जो पूरी सृष्टि की चिन्ता कर रहा है उसे आप की भी चिन्ता है और ये काम वह हमसे आपसे बेहतर कर सकता है, तो अच्छा हो हम ये काम उसे ही करने दें।

Friday, 25 September 2015

मृत्यु का भय आधारहीन है।

कहते हैं सिकन्दर को एक ऐसे झरने की तलाश थी जिसका पानी पीने से आदमी कभी मर नही सकता। एक दिन उसकी तलाश पूरी हो गयी। उसने अपने फौज को झरने के बाहर इन्तजार करने को बोला और खुद उस गुफा मे घुस गया जिसके अन्दर वह झरना था। गुफा के अन्दर थोड़ी दूर और जाने पर वातावरण बदलता मालूम हुआ, उसके अन्दर एक अजीब सी प्रसन्नता का संचार होने लगा और तभी सामने उसे एक खूबसूरत झरना दिखायी दे गया। उसके पूरी शरीर मे खुशी से रोमांच हो आया, आॅखों मे आॅसू आ गये, उसकी बरसों की खोज पूरी हो रही थी। उसके कदमों की रफ्तार तेज हो गयी, वह जल्दी से झरने तक पहॅुच कर उसका पानी पी लेना चाहता था। वह झरने के नीचे पहॅुच गया, हाथ बढ़ाया और तभी उसे एक आवाज सुनायी दी “ रूको ”, सिकन्दर पीछे घूमा पर उसे कोई दिखायी न दिया। वह फिर झरने की तरफ हाथ बढ़ाया और तभी फिर उसे एक कराहती आवाज सुनायी दी “ तुम झरने तक आ गये हो तो जल्दी क्या है ? पानी तो पी ही लोगे पर क्या ये नही जानना चाहोगे कि पानी, पीने से और क्या होगा ?” सिकन्दर फिर उस आवाज की तरफ बढ़ गया, नजदीक गया तो एक बूढ़ा कौवा उसे दिखायी दिया जो जमीन पर पड़ा था पर उसकी हालत बहुत खराब थी। कौवे ने कहा “ हाॅ मैने ही तुम्हे आवाज दी थी, मेरी इस हालत का जिम्मेदार ये झरना है। मैने इसका पानी पीया था, मेरी उम्र पाॅच सौ वर्ष हो चुकी है। मैने अपनी आॅखों के सामने अपनी पत्नी, बच्चों और कितनी पीढि़यों को मरते देख चुका हॅू। सिकन्दर मै मरना चाहता हॅू, पर कोई उपाय नही है। मै क्यों जिन्दा रहॅू ? मै अपने निजी काम भी नही कर सकता, मै अपने लिये भोजन तक नही ढूॅढ सकता, मेरा कोई भी अंग काम नही कर रहा है। मै बिना भोजन के कई कई दिनों तक पड़ा रहता हॅू, परिवार के सदस्यों ने मुझे पुराना खर्चीला कूड़ा करार दे कर घर से बाहर कर दिया है। मै उड़ नही सकता मै हर मौसम की मार यॅही पड़े पड़े सहता रहता हॅू। कभी किसी राहगीर पंछी को यदि मेरी हालत पर तरस आयी तो उसकी दया पर कभी कभी मुझे भोजन नसीब हो जाता है। सिकन्दर मै फिर से बचपन और जवानी जीना चाहता हॅू, अपना परिवार बनाना चाहता हॅू। पर जब तक मरूॅगा नही मुझे कुछ नही मिलेगा। अब अगर तुम पानी पीना चाहते हो तो उधर है झरना जिसका पानी पीने के बाद तुम अमर हो जाओगे।“ सिकन्दर को उस खुशनुमा वातावरण मे भी पसीना हो आया, वह वहाॅ से बहुत जल्दी बाहर हो जाना चाहता था। वह बाहर आया, घोड़े पर बैठा और अपने फौज के साथ अपने विजय यात्रा पर निकल गया।
प्रकुति की व्यवस्था तो देखिये, जीवन के पश्चात् मृत्यु एक विश्राम है, जैसे आदमी दिन भर काम के थकान के बाद रात का विश्राम लेता है। असल मे दिन का मजा भी तभी है जब रात हो विश्राम के लिये, शान्ति के लिये। हर चीज का एक दूसरा छोर है, बिना विपरीत छोर के किसी भी चीज का अस्तित्व हो नही सकता जैसे ऊपर है तो नीचे है, दाॅया बाॅया, धरती आसमान, ठंडा गरम, सुख दुख, तो जीवन की कल्पना आप बिना मृत्यु के कैसे कर सकते हैं ? नया जीवन, नया बचपन, नयी जवानी, नया साथी पाने के लिये पुराने का परित्याग आप को करना ही होगा। थोड़ा और गहराई से सोचेंगे तो मृत्यु के भय से आप मुक्त हो जायेंगे, यह भय नया जीवन पाने की खुशी मे बदल जायेगा और मृत्यु का भय आपको आधारहीन लगने लगेगा।
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Thursday, 24 September 2015

समस्या का हल

emotion pain chart
इस दुनिया मे समस्या को लोग दो तरह से सुलझाते हैं, एक तो समस्या की जड़ को जस का तस छोड़ कर ऊपर से टहनियों और पत्तों को काट काट कर सोचते हैं कि समस्या सुलझ रही है, और हममे से लगभग लोग यही कर रहे है।ं दूसरे कुछ लोग वे होते हैं जो पत्ते और टहनियों के बजाय सीधा जड़ को ही खोदकर फेंक देते हैं।
हम सोचते हैं ज्यादा पैसा हो जायेगा तो समस्या सुलझ जायेगी, सारे सुख सुविधा के संसाधन हो जायेंगे तो समस्या सुलझ जायेगी। पर असल मे ऐसा हुआ है क्या ? नही, उल्टे ही मानव पहले से ज्यादा दुखी हुआ है, उसकी शान्ति कम होती गयी है। इसी तरह हमारी व्यक्तिगत समस्यायें भी है, वे सुलझने के बजाय और उलझती गयीं हैं, क्यों कि हमने समस्या को जड़ से खत्म करने के बजाय, सारा ध्यान पत्तो और टहनियों पर दिया। एक समस्या को सुलझाने के लिये दूसरी खड़ी करते गये। हम सुखी होने के बजाय दुखी होते गये।
दुख से निपटने का एक ही तरीका है, आपको तादात्म्य छोड़ना पड़ेगा। आदमी अपनी बुद्धि से कहीे पहुॅचने के बजाय अपने ही जाल मे उलझ गया है। उसे प्रकृति पर भरोसा ही नही है। इस पूरी सृष्टि मे मानव ही ऐसा है जिसे प्रकृति से ज्यादा भरोसा अपनी बुद्धि पर है, और यही उसकी समस्या है।
एक प्रयोग करें, जब आप कहीं उलझ जाॅयें, आप को अपनी समस्या का हल न मिल रहा हो तो आप अपनी बुद्धि को छोड़ दें, रिलैक्स हो जाॅये जैसे कुछ हुआ ही न हो और प्रकृति को अपना काम करने दें। उस प्रकृति को जो पूरी दुनिया को सामंजस्य मे रखे हुये है। आपको छोड़ कर इस सृष्टि मे सारे जानवर, पेड,़ पौधे और कीड़े मकोड़े समस्या से मुक्त हैं। जिस दिन आप प्रकृति के हवाले अपने आप को कर देते हैं, बुद्धि को छोड़ देते हैं, आप सहज हो जाते हैं और शनैः शनैः आप को समस्या का हल मिल जाता है।

Wednesday, 23 September 2015

ध्यान की सबसे आसान विधि

ध्यान कुछ करने की चीज नही है, यह सिर्फ न करने की चीज है। आराम से जिस भी मुद्रा मे सुख पूर्वक बैठ सकते हों, बैठें और कोशिश करें कि रीढ़ एक दम सीधा रखें। आॅख बन्द कर लें, साॅसों पर ध्यान दें। जितनी देर आप साॅसों पर ध्यान दे पायेगे, आप देखेंगे कि आप बाकी चीज भूल गये हैं। सिर्फ साॅसों पर ध्यान करते करते कुछ दिन बाद आप पायेंगे कि आप अन्दर सरकने लगे हैं। फिर अन्दर सरकते सरकते कुछ दिन बाद आप अपने को देख सकेंगे, अपने को जान लेंगे और फिर आप ब्रह्म को जान लेंगे।
विपश्यना ध्यान
ध्यान की और बहुत सारी विधियाॅ हैं उनमे विपस्सना ध्यान का अपना महत्व है। ये पूर्णतया वैज्ञानिक है। लगभग 2500 वर्ष पहले इस विधि को भगवान बुद्ध ने पुनः सर्वसुलभ बनाया। यह सब के लिये कल्याणकारी है, इसे कोई भी कर सकता है। इस विधि मे इस बात की खेज है कि आखिर मै हॅू कौन ? इस विधि से साधना करने पर साधक को यह स्पष्ट दिखने लगता है कि यह शरीर सिर्फ लगातार उत्पन्न और व्यय होने वाला तरंग मात्र है। जितनी भी बस्तुयें, घटनायें, स्थिति या व्यक्ति हैं वे सब मरणधर्मा हैं। सब क्षणभंगुर, नश्वर और परिवर्तनशील हैं। इस क्षण प्रतिक्षण् परिवर्तनशील धारा को निरासक्त भाव से देखना ही विपश्यना है।

TENSION....NEVER: हमें बख्श दें

TENSION....NEVER: हमें बख्श दें: परमात्मा इतना विशाल है कि  वह आप के किसी मूर्ति, फोटो, आकार, मंदिर , मस्जिद या गिरिजा में नहीं समां सकता। वह विशाल से भी विशाल और छुद्र से ...

हमें बख्श दें

परमात्मा इतना विशाल है कि  वह आप के किसी मूर्ति, फोटो, आकार, मंदिर , मस्जिद या गिरिजा में नहीं समां सकता। वह विशाल से भी विशाल और छुद्र से भी छुद्र है।  विशाल इतना है कि इस पृथ्वी जैसे पचास हजार से ज्यादा पृथ्वी मैनेज कर रहा है जैसा कि  हमारे वैज्ञानिक बताते हैं,  और छोटा इतना है की अंत में गायब हो जाता है,  हमारे वैज्ञानिकों  कीं पहुँच से बहुत दूर हो जाता है। लेकिन दुनिया तब भी चलती रहती है। इसी लिए आज तक कोई नहीं समझ पाया कि दुनिया बनी किससे  है , और इसका परिचालन कैसे हो रहा है , कौन कर रहा है ? अब ऐसे में अगर आप परमात्मा को कोई आकार देते हैं या कोई सीमा प्रदान करते हैं तो ये हमारी आपकी लघु तम मानसिकता के अलावा कुछ नहीं है। परमात्मा को कोई समझा नहीं पाया , क्यों कि परमात्मा कोई समझाने की चीज भी नहीं है , परमात्मा को सिर्फ महसूस किया जा सकता है। परमात्मा हमारे आस पास हर जगह है।  असल में सब कुछ परमात्मा ही है , बिना परमात्मा के कुछ भी सम्भव ही नहीं है। दृश्य अदृश्य में उपस्थित हर चीज अपना धर्म इस लिए दिखा पाता है कि उसके अंदर परमात्मा का वास होता है। हम सब परमात्मा के अंदर ही वास करते हैं और परमात्मा हमारे एक एक रोम में वास करता है। परमात्मा सबसे बड़ा वैज्ञानिक है वह अपने अंदर बहुत से रहस्य छुपा रखा है। जब हमारे वैज्ञानिक कुछ खोज करते हैं तो वे अलग से कुछ पैदा नहीं करते हैं , बल्कि प्रकृति के गर्भ में छुपे अनंत रहस्यों से कुछ की झलक पा जाते हैं। इसी लिए मैं कहता हूँ कि हमारी आपकी हैसियत नहीं है उसे सीमा प्रदान करें ।  उसके लिए लड़ें , एक दूसरे की हत्या करें  ? किस भगवान ने कहा , किस अल्लाह ने किस जीसस ने दूसरे को धर्म विरोधी कहने को कहा ? असल में लड़ने का मन हमारा आप का है , धर्म  तो एक बहाना है। लड़ना हमारे स्वाभाव में है।  हम पैदा ही लड़ते लड़ते हुए हैं।  हमारा विकास ही जानवर से हुआ है , और हमारी पाशविकता अभी गयी नहीं है।  जब लोग लड़ रहे हों उनके चेहरों को ध्यान से देखिये किन्ही लड़ते कुत्तो जैसे शक्ल रहती है या नहीं , किसी अकेली लड़की को अकेले में मिलने पर अपने को देखे पाशविकता पैदा होती है की नहीं ? हमारे लड़ने से न तो परमात्मा को दुःख होता है न ही प्रसन्नता , उसे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता है, परन्तु हमें फर्क पड़ता है। परमात्मा तो अनंत है अथाह है अबूझ है , इसी लिए इस जगत को हिन्दू माया कहते हैं। हमारे आपके लड़ने से परमात्मा को नहीं , हमें फर्क पड़ता है।
समुद्र के तेज लहरों से बहुत सी छोटी छोटी मछलियाँ बाहर आ कर तड़प रही थी , एक व्यक्ति एक एक मछली को उठा कर वापस समुद्र में फेंक दे रहा था , दूसरे व्यक्ति ने कहा तुम्हारे एक एक  मछली को वापस समुद्र में फेकने से समुद्र को क्या फर्क पड़ेगा ? उस आदमी ने बहुत ही अछा जवाब दिया समुद्र को तो नहीं पर,  उस मछली पर जरूर फर्क पड़ेगा जिसको जीवन दान मिल गया है। हे धर्म के ठेके दारों हमें जीने दो , आप के लड़ने से हमारी दुनिया तबाह हो रही है।  आप हमारे परमात्मा को खुश करने का ठेका बंद कर दे।  हम अपने अपने परमात्मा को अपने अपने तरीके से खुश कर लेंगे। आप हमें बख्श दें , आप की बड़ी मेहरबानी होगी। 

Monday, 21 September 2015

I am not owner

पैदा होना,  बड़ा होना,  जीवन  भर पैसे के लिए संघर्ष करना, बाहरी दुनिया में ऐशो आराम के संसाधन जुटाना,  बच्चों को बड़ा करना, पढ़ाना लिखाना , बूढ़ा हो जाना फिर घिसट घिसट कर मर जाना।  क्या यही है जीवन ? क्या यही लक्ष्य है जीवन का ? क्या यही चरम उद्देश्य है जीवन का ? यह सवाल हम सब के जेहन में कभी न कभी जरूर आता है।  किसी को पहले आ  जाता है , किसी को बाद में आता  है , किसी को कभी नहीं आता  है , आता  भी है तो वह उसे व्यर्थ का सवाल मान कर जीवन भर झुठलाते रह जाता है, और अपने काम में लगा रह जाता है , या फिर मंदिर मस्जिद गिरिजा जा कर अपनी धार्मिकता दिखा आता है। 
एक बार भगवान बुद्ध के पास एक अमीर आदमी आया उसने कहा मेरे पास अथाह सम्पत्ति है , मुझे लोगो पर बड़ी दया आती है , मै लोगो की सेवा करना चाहता हूँ , उन्हें कुछ देना चाहता हूँ। कहते है  भगवान बुद्ध काफी देर तक उसको दया भाव से देखते रहे और फिर उनकी आँखों में आँसू  आ  गए।  वह आदमी घबरा गया उसने कहा क्या बात है महाराज ? ऐसा क्या अपने मुझ में देखा कि आपकी आँखों में आँसू आ गए ?  भगवान बुद्ध ने कहा तुम दुसरो पर दया करने चले हो मुझे तुम पर दया आ  रही है ? जब अभी तक तुम्हे अपने पर दया नहीं आई है तो तुम दूसरे पर कैसे दया करोगे ? तुम पहले अपने पर तो दया कर लो। तुम जिस संपत्ति को अपना बता रहे हो , जिस पर तुम्हे अहंकार है वह संपत्ति तो तो असल में तुम्हारी है ही नहीं , क्या तुम उस संपत्ति को अपने साथ ले जा पाओगे ? जो संपत्ति तुम ले जा सकते हो वह तो तुम्हारे पास जरा भी नहीं है तुम तो निरे कंगाल हो इस लिए तुम्हे देख कर मेरे आँखों में आँसू  आ गए। असल में तुम्हारे पास संपत्ति तो है पर तुम्हे उसका पता नहीं है और तुम उस पर अपने अहंकार , स्वार्थ और चालबाजियों से इतनी मिटटी डाल  चुके हो की वह तुम्हे नजर ही नहीं आ  आ सकता। वह अथाह संपत्ति तुम्हारे पास थी और तुम जीवन भर छुद्र के पीछे भागते रहे।  चेतना को जगाओ और जो तुम जो  साम्राज्य ले कर पैदा हुए थे उसके मालिक बन जाओ। 
असल में हम सब इसी तरह हैं , हम पूरी दुनिया पा लेना चाहते हैं और इस चक्कर अपने को भूलते जाते हैं , कभी अपनी तरफ आना ही नहीं चाहते , अपने को जानना ही नहीं चाहते , अपने लिए समय ही नहीं है।  पूरा जीवन लगा देते है अपने बाद संपत्ति छोड़ जाने के लिए। जो अपनी आतंरिक संपत्ति पा लेता है उसी का जीवन सफल हो पता है।