वो मेरा सबसे अच्छा दोस्त था, उसके पिता टीचर थे, और ये उनकी एक मात्र सन्तान थी। हमारे उसके नम्बर लगभग बराबर आते थे, जब हम थोड़े और ऊपर के क्लास मे गये तो अंकल ने उसके मन मे ये भरना शुरू कर दिया कि ”हर काम मे एक नमबर आना जरूरी है।“ अब वो मेरे साथ खेलने भी नही जाता था क्यों कि उसे हमेशा नम्बर एक की तैयारी जो करनी रहती थी। क्लास मे सबसे पहले आना, टीचर कुछ भी पूछे तो सबसे पहले जबाब देना, फिर सबसे पहले वापस अपने घर पहॅुच जाना। चैदह साल की उम्र तक आते आते अंकल उस के ऊपर पूरी तरह छा गये थे। रात मे दस ग्यारह बजे तक पढ़ाई करना, सबेरे पाॅच बजे उठना, पढ़ना, जागिंग, एक्सरसाइज और फिर स्कूल। रात दिन नम्बर एक के सुझावों से वह, नम्बर एक के प्रति सम्मोहित हो चुका था। अब वाकई हर क्षेत्र मे उसके रिजल्ट भी नम्बर एक आना शुरू हो गये थे, लेकिन मैने अंकल को देखा तब भी वो हर दम किसी न किसी से उसकी तुलना करते ही रहते थे और, उसे और अच्छा करने के लिये डाॅटते रहते थे।
हम इन्टरमीडियेट मे पहुॅच गये थे, मै अक्सर अपने सबसे अच्छे दोस्त से बात करने का मौका ढूॅढते रहता था पर हम लोग ज्यादा बात नही कर पाते थे, पर उस दिन वह मुझसे खुद मिलने आया और बताया कि वह कल अपने मामा की बेटी की शादी मे जा रहा है। वह वाकई मे बहुत उत्तेजित था। सालों बाद मैने उसके चेहरे पर गजब की खुशी देखी थी। पर कौन जानता है कि कल के गर्भ मे क्या है ? कल हम मिले लेकिन जिला अस्पताल मे। नम्बर एक की आदत ने उसे सबसे आखिर की लाइन मे खड़ा कर दिया था जहाॅ से न कोई आगे जा सकता था न ही पीछे। सबसे पहले Train मै पकड़ लॅू, इस इच्छा से वह Train रूकने के पहले ही Train मे घुसने लगा था, पर उसका पैर स्लिप कर गया था। उसका पैर Train के पहियों के नीचे आ कर कट गया था। खून ज्यादा बहने के कारण और पैर मे इन्फेक्शन फैल जाने के कारण डाक्टर उसे बचा न सके थे।
जब मै उससे मिलने गया तो उसे समय बड़ा ही दर्दनाक मंजर हो गया था। वह मेरा पैर पकड़ने की कोशिश करने लगा था “बचा ले मेरे दोस्त, मुझे तुझसे बहुत सी बातें करनी है, तेरे साथ खेलना है।” अंकल इधर उधर पागलों की तरह भाग रहे थे उनकी जुबान पर बस एक ही रट थी ”हे परमात्मा बचा ले मेरे बेटे को , नही चाहिये मुझे नम्बर एक, मुझे बस मेरा बेटा वापस कर दे।“ पर अब शायद बहुत देर हो चुकी थी, थोड़ी ही देर मे नम्बर एक, नम्बर जीरो बन गया था।
बहुत बाद मे सुनने को मिला कि अण्टी ने दुख और अवसाद मे अंकल से तलाक ले लिया और जल्दी ही चल बसीं।
समाज का सबसे खतरनाक रोग जानते है क्या है ? रेस, उन चीजों के लिये जो अपने पास नही है। अपनी 75 प्रतिशत नियामतों के लिये परमात्मा को धन्यवाद न दे कर उन 25 प्रतिशत भाग के लिये रोना, चिन्तित होना जो अपने पास नही है, और यही सारे रोगों का जड़ है। छोड़ दीजिये 25 प्रतिशत के लिये रोना, भागना और मनाना शुरू कर दीजिये 75 प्रतिशत का जश्न और देखिये आप के जीवन से रोग भाग जाते हैं कि नही। बन्द कर दीजिये परमात्मा को, माॅ बाप को , समाज को कोसना, उन्हे उनकी अज्ञानता के लिये क्षमा कर दीजिये और सीख लीजिये दिल से खुश रहना और फिर देखिये फर्क पड़ता है कि नही। अपने को 75 प्रतिशत खुशी देना शुरू करिये, बाकी के 25 प्रतिशत खुशी ख्ुाद चल कर आप के पास आ जायेंगे। यही नियम है, और ये कभी गलत नही होता।
हम इन्टरमीडियेट मे पहुॅच गये थे, मै अक्सर अपने सबसे अच्छे दोस्त से बात करने का मौका ढूॅढते रहता था पर हम लोग ज्यादा बात नही कर पाते थे, पर उस दिन वह मुझसे खुद मिलने आया और बताया कि वह कल अपने मामा की बेटी की शादी मे जा रहा है। वह वाकई मे बहुत उत्तेजित था। सालों बाद मैने उसके चेहरे पर गजब की खुशी देखी थी। पर कौन जानता है कि कल के गर्भ मे क्या है ? कल हम मिले लेकिन जिला अस्पताल मे। नम्बर एक की आदत ने उसे सबसे आखिर की लाइन मे खड़ा कर दिया था जहाॅ से न कोई आगे जा सकता था न ही पीछे। सबसे पहले Train मै पकड़ लॅू, इस इच्छा से वह Train रूकने के पहले ही Train मे घुसने लगा था, पर उसका पैर स्लिप कर गया था। उसका पैर Train के पहियों के नीचे आ कर कट गया था। खून ज्यादा बहने के कारण और पैर मे इन्फेक्शन फैल जाने के कारण डाक्टर उसे बचा न सके थे।
जब मै उससे मिलने गया तो उसे समय बड़ा ही दर्दनाक मंजर हो गया था। वह मेरा पैर पकड़ने की कोशिश करने लगा था “बचा ले मेरे दोस्त, मुझे तुझसे बहुत सी बातें करनी है, तेरे साथ खेलना है।” अंकल इधर उधर पागलों की तरह भाग रहे थे उनकी जुबान पर बस एक ही रट थी ”हे परमात्मा बचा ले मेरे बेटे को , नही चाहिये मुझे नम्बर एक, मुझे बस मेरा बेटा वापस कर दे।“ पर अब शायद बहुत देर हो चुकी थी, थोड़ी ही देर मे नम्बर एक, नम्बर जीरो बन गया था।
बहुत बाद मे सुनने को मिला कि अण्टी ने दुख और अवसाद मे अंकल से तलाक ले लिया और जल्दी ही चल बसीं।
समाज का सबसे खतरनाक रोग जानते है क्या है ? रेस, उन चीजों के लिये जो अपने पास नही है। अपनी 75 प्रतिशत नियामतों के लिये परमात्मा को धन्यवाद न दे कर उन 25 प्रतिशत भाग के लिये रोना, चिन्तित होना जो अपने पास नही है, और यही सारे रोगों का जड़ है। छोड़ दीजिये 25 प्रतिशत के लिये रोना, भागना और मनाना शुरू कर दीजिये 75 प्रतिशत का जश्न और देखिये आप के जीवन से रोग भाग जाते हैं कि नही। बन्द कर दीजिये परमात्मा को, माॅ बाप को , समाज को कोसना, उन्हे उनकी अज्ञानता के लिये क्षमा कर दीजिये और सीख लीजिये दिल से खुश रहना और फिर देखिये फर्क पड़ता है कि नही। अपने को 75 प्रतिशत खुशी देना शुरू करिये, बाकी के 25 प्रतिशत खुशी ख्ुाद चल कर आप के पास आ जायेंगे। यही नियम है, और ये कभी गलत नही होता।
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