
इस दुनिया मे समस्या को लोग दो तरह से सुलझाते हैं, एक तो समस्या की जड़ को जस का तस छोड़ कर ऊपर से टहनियों और पत्तों को काट काट कर सोचते हैं कि समस्या सुलझ रही है, और हममे से लगभग लोग यही कर रहे है।ं दूसरे कुछ लोग वे होते हैं जो पत्ते और टहनियों के बजाय सीधा जड़ को ही खोदकर फेंक देते हैं।
हम सोचते हैं ज्यादा पैसा हो जायेगा तो समस्या सुलझ जायेगी, सारे सुख सुविधा के संसाधन हो जायेंगे तो समस्या सुलझ जायेगी। पर असल मे ऐसा हुआ है क्या ? नही, उल्टे ही मानव पहले से ज्यादा दुखी हुआ है, उसकी शान्ति कम होती गयी है। इसी तरह हमारी व्यक्तिगत समस्यायें भी है, वे सुलझने के बजाय और उलझती गयीं हैं, क्यों कि हमने समस्या को जड़ से खत्म करने के बजाय, सारा ध्यान पत्तो और टहनियों पर दिया। एक समस्या को सुलझाने के लिये दूसरी खड़ी करते गये। हम सुखी होने के बजाय दुखी होते गये।
दुख से निपटने का एक ही तरीका है, आपको तादात्म्य छोड़ना पड़ेगा। आदमी अपनी बुद्धि से कहीे पहुॅचने के बजाय अपने ही जाल मे उलझ गया है। उसे प्रकृति पर भरोसा ही नही है। इस पूरी सृष्टि मे मानव ही ऐसा है जिसे प्रकृति से ज्यादा भरोसा अपनी बुद्धि पर है, और यही उसकी समस्या है।
एक प्रयोग करें, जब आप कहीं उलझ जाॅयें, आप को अपनी समस्या का हल न मिल रहा हो तो आप अपनी बुद्धि को छोड़ दें, रिलैक्स हो जाॅये जैसे कुछ हुआ ही न हो और प्रकृति को अपना काम करने दें। उस प्रकृति को जो पूरी दुनिया को सामंजस्य मे रखे हुये है। आपको छोड़ कर इस सृष्टि मे सारे जानवर, पेड,़ पौधे और कीड़े मकोड़े समस्या से मुक्त हैं। जिस दिन आप प्रकृति के हवाले अपने आप को कर देते हैं, बुद्धि को छोड़ देते हैं, आप सहज हो जाते हैं और शनैः शनैः आप को समस्या का हल मिल जाता है।
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