ध्यान कुछ करने की चीज नही है, यह सिर्फ न करने की चीज है। आराम से जिस भी मुद्रा मे सुख पूर्वक बैठ सकते हों, बैठें और कोशिश करें कि रीढ़ एक दम सीधा रखें। आॅख बन्द कर लें, साॅसों पर ध्यान दें। जितनी देर आप साॅसों पर ध्यान दे पायेगे, आप देखेंगे कि आप बाकी चीज भूल गये हैं। सिर्फ साॅसों पर ध्यान करते करते कुछ दिन बाद आप पायेंगे कि आप अन्दर सरकने लगे हैं। फिर अन्दर सरकते सरकते कुछ दिन बाद आप अपने को देख सकेंगे, अपने को जान लेंगे और फिर आप ब्रह्म को जान लेंगे।
विपश्यना ध्यान
ध्यान की और बहुत सारी विधियाॅ हैं उनमे विपस्सना ध्यान का अपना महत्व है। ये पूर्णतया वैज्ञानिक है। लगभग 2500 वर्ष पहले इस विधि को भगवान बुद्ध ने पुनः सर्वसुलभ बनाया। यह सब के लिये कल्याणकारी है, इसे कोई भी कर सकता है। इस विधि मे इस बात की खेज है कि आखिर मै हॅू कौन ? इस विधि से साधना करने पर साधक को यह स्पष्ट दिखने लगता है कि यह शरीर सिर्फ लगातार उत्पन्न और व्यय होने वाला तरंग मात्र है। जितनी भी बस्तुयें, घटनायें, स्थिति या व्यक्ति हैं वे सब मरणधर्मा हैं। सब क्षणभंगुर, नश्वर और परिवर्तनशील हैं। इस क्षण प्रतिक्षण् परिवर्तनशील धारा को निरासक्त भाव से देखना ही विपश्यना है।
ध्यान की और बहुत सारी विधियाॅ हैं उनमे विपस्सना ध्यान का अपना महत्व है। ये पूर्णतया वैज्ञानिक है। लगभग 2500 वर्ष पहले इस विधि को भगवान बुद्ध ने पुनः सर्वसुलभ बनाया। यह सब के लिये कल्याणकारी है, इसे कोई भी कर सकता है। इस विधि मे इस बात की खेज है कि आखिर मै हॅू कौन ? इस विधि से साधना करने पर साधक को यह स्पष्ट दिखने लगता है कि यह शरीर सिर्फ लगातार उत्पन्न और व्यय होने वाला तरंग मात्र है। जितनी भी बस्तुयें, घटनायें, स्थिति या व्यक्ति हैं वे सब मरणधर्मा हैं। सब क्षणभंगुर, नश्वर और परिवर्तनशील हैं। इस क्षण प्रतिक्षण् परिवर्तनशील धारा को निरासक्त भाव से देखना ही विपश्यना है।
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