Friday, 25 September 2015

मृत्यु का भय आधारहीन है।

कहते हैं सिकन्दर को एक ऐसे झरने की तलाश थी जिसका पानी पीने से आदमी कभी मर नही सकता। एक दिन उसकी तलाश पूरी हो गयी। उसने अपने फौज को झरने के बाहर इन्तजार करने को बोला और खुद उस गुफा मे घुस गया जिसके अन्दर वह झरना था। गुफा के अन्दर थोड़ी दूर और जाने पर वातावरण बदलता मालूम हुआ, उसके अन्दर एक अजीब सी प्रसन्नता का संचार होने लगा और तभी सामने उसे एक खूबसूरत झरना दिखायी दे गया। उसके पूरी शरीर मे खुशी से रोमांच हो आया, आॅखों मे आॅसू आ गये, उसकी बरसों की खोज पूरी हो रही थी। उसके कदमों की रफ्तार तेज हो गयी, वह जल्दी से झरने तक पहॅुच कर उसका पानी पी लेना चाहता था। वह झरने के नीचे पहॅुच गया, हाथ बढ़ाया और तभी उसे एक आवाज सुनायी दी “ रूको ”, सिकन्दर पीछे घूमा पर उसे कोई दिखायी न दिया। वह फिर झरने की तरफ हाथ बढ़ाया और तभी फिर उसे एक कराहती आवाज सुनायी दी “ तुम झरने तक आ गये हो तो जल्दी क्या है ? पानी तो पी ही लोगे पर क्या ये नही जानना चाहोगे कि पानी, पीने से और क्या होगा ?” सिकन्दर फिर उस आवाज की तरफ बढ़ गया, नजदीक गया तो एक बूढ़ा कौवा उसे दिखायी दिया जो जमीन पर पड़ा था पर उसकी हालत बहुत खराब थी। कौवे ने कहा “ हाॅ मैने ही तुम्हे आवाज दी थी, मेरी इस हालत का जिम्मेदार ये झरना है। मैने इसका पानी पीया था, मेरी उम्र पाॅच सौ वर्ष हो चुकी है। मैने अपनी आॅखों के सामने अपनी पत्नी, बच्चों और कितनी पीढि़यों को मरते देख चुका हॅू। सिकन्दर मै मरना चाहता हॅू, पर कोई उपाय नही है। मै क्यों जिन्दा रहॅू ? मै अपने निजी काम भी नही कर सकता, मै अपने लिये भोजन तक नही ढूॅढ सकता, मेरा कोई भी अंग काम नही कर रहा है। मै बिना भोजन के कई कई दिनों तक पड़ा रहता हॅू, परिवार के सदस्यों ने मुझे पुराना खर्चीला कूड़ा करार दे कर घर से बाहर कर दिया है। मै उड़ नही सकता मै हर मौसम की मार यॅही पड़े पड़े सहता रहता हॅू। कभी किसी राहगीर पंछी को यदि मेरी हालत पर तरस आयी तो उसकी दया पर कभी कभी मुझे भोजन नसीब हो जाता है। सिकन्दर मै फिर से बचपन और जवानी जीना चाहता हॅू, अपना परिवार बनाना चाहता हॅू। पर जब तक मरूॅगा नही मुझे कुछ नही मिलेगा। अब अगर तुम पानी पीना चाहते हो तो उधर है झरना जिसका पानी पीने के बाद तुम अमर हो जाओगे।“ सिकन्दर को उस खुशनुमा वातावरण मे भी पसीना हो आया, वह वहाॅ से बहुत जल्दी बाहर हो जाना चाहता था। वह बाहर आया, घोड़े पर बैठा और अपने फौज के साथ अपने विजय यात्रा पर निकल गया।
प्रकुति की व्यवस्था तो देखिये, जीवन के पश्चात् मृत्यु एक विश्राम है, जैसे आदमी दिन भर काम के थकान के बाद रात का विश्राम लेता है। असल मे दिन का मजा भी तभी है जब रात हो विश्राम के लिये, शान्ति के लिये। हर चीज का एक दूसरा छोर है, बिना विपरीत छोर के किसी भी चीज का अस्तित्व हो नही सकता जैसे ऊपर है तो नीचे है, दाॅया बाॅया, धरती आसमान, ठंडा गरम, सुख दुख, तो जीवन की कल्पना आप बिना मृत्यु के कैसे कर सकते हैं ? नया जीवन, नया बचपन, नयी जवानी, नया साथी पाने के लिये पुराने का परित्याग आप को करना ही होगा। थोड़ा और गहराई से सोचेंगे तो मृत्यु के भय से आप मुक्त हो जायेंगे, यह भय नया जीवन पाने की खुशी मे बदल जायेगा और मृत्यु का भय आपको आधारहीन लगने लगेगा।
for spiritual posts visit http://calmnpeace.com

No comments:

Post a Comment