Monday, 28 September 2015

आकाक्षांये अनन्त हैं।

एक राजा यूॅ ही एक दिन, मन किया और बिना फौज फाटे के घूमने निकल लिया। कुछ दूर जाने के बाद, एक गाॅव के बाहर एक बुढि़या हाथ मे एक पात्र लिये खड़ी थी और उस पात्र से कुछ बुदबुदा रही थी। राजा कुतूहल बस वहाॅ रूक गया, और बुढि़या को देखने लगा। बुढि़या के पात्र और व्यवहार दोनो ही अजीब थे। राजा को देख कर बुढि़या ने अपना सिर ऊपर उठाया और राजा की तरफ प्रश्नवाचक निगाहों से देखा। राजा ने कहा “ये तुम्हारे हाथ मे कैसा अजीब पात्र है? और तुम यहाॅ क्या कर रही हो ?“ बुढि़या ने कहा “मेरे हाथ मे ये भिक्षा पात्र है, जिसे आज तक कोई भर नही पाया है, मेरे भी मरने के दिन नजदीक हैं और मै यहाॅ खड़ी हो कर अपने पति को बता रही थी कि मुझे भी खाली हाथ ही मरना पड़ेगा, ये पात्र कोई भर नही पायेगा।“ राजा को बड़ा विस्मय हुआ उसने बुढि़या से कहा “कि ये तेरा छोटा सा तो पात्र है, कैसे नही भरेगा ? तू सही जगह माॅगने नही गयी होगी। मै यहाॅ का राजा हॅू तू कल सूर्योदय होते ही मेरे महल के बाहर आ जाना, मै प्रातः भ्रमण को जाते समय तेरा पात्र हीरे मोतियों से भर दॅूगा।“ बुढि़या ने कहा “महाराज एक बार और सोच लीजिये मै कल आखिरी बार भिक्षाटन को निकलॅूगी और खाली पात्र के साथ वापस न आ सकूूॅगी, या तो भरे पात्र के साथ आऊॅगी या फिर वहीं मर जाऊॅगी।“ राजा ने कहा ”इसमे सोचने जैसा कुछ नही है, तुम कल आ जाना।”
राजा के लिये किसी भिखारी को भिक्षा देना छोटी मोटी बात थी, वह महल गया, दिन भर अपना काम काज किया और अपना वादा भूल भी गया और आराम से सो गया। सुबह वह पा्रतः भ्रमण के लिये महल के बाहर कदम ही रखा था वह बुढि़या राजा को नजर आ गयी, साथ ही उसको दिया गया अपना वादा भी। उसने एक चाकर को को भेज कर खजाॅची को बुला लिया और बोला ” इस बुढि़या का भिक्षा पात्र अशर्फियों से भर दो।”
राजा जब भ्रमण से लौटा तो देखा उसके महल के बाहर पूरी भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी। सारे दरबारी भी आ चुके थे और बुढि़या को वापस जाने को मना रहे थे, पर उसकी जिद थी कि वह भरा पात्र ही ले कर जायेगी, राजा ने उससे वादा किया है। राजा ने दरबारियों से पूछा ”क्या मेरा खजाना खाली हो गया है जो तुम लोगों ने इतना तमाशा बना दिया है ?” खजाॅची ने कहा ”महाराज आप अपना वादा तोड़ दीजिये नही तो सचमुच खजाना खाली हो जायेगा, इसके पात्र मे चाहे जितना डालता हॅू वह कुछ न कुछ खाली ही रह जा रहा है।” राजा ने ”कहा मेरे सामने भरो मै भी देखता हॅू।” राजा अपनी जिद की वजह से दोपहर तक कंगाल हो गया। सब कुछ उस पात्र मे डाला जा चुका था, पर उसका कुछ भाग अभी भी खाली था।
राजा अब परास्त हो चुका था। उसने बुढि़या के पैरों मे अपना सिर रख दिया और बोला ”मै राजा होने के अहंकार मे इसे भरने की कोशिश करता रहा, पर मै अब हार गया। मुझे अफसोस है कि मै अपना वादा नही पूरी कर पाया, पर ये तो बता दो कि इस पात्र का क्या राज है ?
बुढि़या ने कहा ”ये पात्र नही मेरे पति की खोपड़ी है, जो रात दिन पैसा पैसा करते, दिन रात मेहनत करते करते, समय से पहले चल बसा। उसकी याद सदैव बनी रहे इस लिये उसकी खोपड़ी मैने अपने पास रख ली, और अब उसी मे भिक्षा माॅग रही हॅू।”
राजा को समझ आ चुका था कि मानव की खोपड़ी ही ऐसी है, उसकी इच्छायें इतनी अनन्त हैं कि चाहे पूरी प्थ्वी की दौलत इसमे डाल दी जाये पर ये सन्तुष्ट कभी नही होगी, कभी नही भरेगी।

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